‘केवल मनोरंजन’ से व्यसनमुक्त जीवन तक की यात्रा

ख़बरिस्तान नेटवर्क : पंजाब आज भी नशीले पदार्थों के सेवन की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। ऐसे समय में आर्ट ऑफ लिविंग के शिक्षक हिमांशु छाबड़ा की जीवन यात्रा की शुरुआत एक ऐसी साधारण घटना से हुई, जिसके दूरगामी परिणामों की उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे 26 वर्षीय हिमांशु को उनके कॉलेज के एक वरिष्ठ विद्यार्थी ने सिगरेट पीने की पेशकश की। उन्हें धूम्रपान कभी पसंद नहीं था। वे अपने मित्रों को भी इससे दूर रहने की सलाह देते थे। फिर भी, बार-बार आग्रह किए जाने पर उन्होंने धूम्रपान किया। अगले दिन उन्होंने स्वयं सिगरेट खरीदी, अपने घर की बालकनी में उसे पिया और उल्टी कर दी। किंतु शरीर की इस तीव्र प्रतिक्रिया के बाद भी वे धूम्रपान से दूर नहीं हुए।

मूल रूप से पंजाब के फाजिल्का के रहने वाले हिमांशु वर्ष 2016 में पत्रकारिता एवं जनसंचार की पढ़ाई करने दिल्ली आए थे। सिगरेट से आरंभ हुआ यह सिलसिला धीरे-धीरे गांजे और मदिरा के सेवन तक पहुँच गया। कोविड महामारी के दौरान जब वे पंजाब में रहकर फिल्म निर्माण के क्षेत्र में काम कर रहे थे, तब फिल्म के कार्यस्थल पर मिले मित्रों के माध्यम से उन्हें गांजे का सेवन करने की आदत लगी। मदिरापान भी धीरे-धीरे कभी-कभार शाम को की जाने वाली गतिविधि से बढ़कर दिन में भी होने लगा।
इसके बावजूद हिमांशु स्वयं को व्यसन से जूझता हुआ व्यक्ति नहीं मानते थे। वे निर्देशकों और कलाकारों के साथ काम कर रहे थे, धन कमा रहे थे और अपने मनचाहे व्यवसाय में आगे बढ़ रहे थे। वे बताते हैं, “मैं यह सब केवल मनोरंजन के लिए कर रहा था। मुझे ऐसा नहीं लगता था कि मुझे किसी वस्तु की आवश्यकता है।”

लेकिन इसके संकेत धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगे थे। सिगरेट या गांजा उपलब्ध न होने पर वे क्रोधित और चिड़चिड़े हो जाते थे। इन पदार्थों को प्राप्त करने का विचार उनके मन पर अधिकाधिक छाने लगा था। यदि किसी अपरिचित स्थान पर फिल्म की शूटिंग होती, तो वे वहाँ लोगों से इन पदार्थों की उपलब्धता के बारे में पूछताछ करते या इंटरनेट पर खोजते। एक समय ऐसा भी आया, जब उन्होंने ऐसे लोगों को खोजने के लिए परिचय के माध्यम से मित्र बनाने वाले वेबसाइट व एप का का सहारा लिया, जिनकी परिचय संबंधी जानकारी में धूम्रपान या गांजे का उल्लेख होता था। उन्हें आशा रहती थी कि ऐसे लोग उन्हें ये पदार्थ उपलब्ध कराने में सहायता कर सकेंगे।

दो से तीन वर्षों के भीतर यह आदत उनके जीवन में गहराई तक पैठ बना चुकी थी। एक वर्ष ऐसा भी आया, जब वे प्रतिदिन पाँच या छह, कभी-कभी छह से सात गांजे की सिगरेट पीने लगे। रात को वे एक सिगरेट तैयार करते, उसका आधा हिस्सा पीते और शेष अपने बिस्तर के पास रख देते, ताकि सुबह उठकर उसे पी सकें। वे कहते हैं, “मैं इसी चक्र में फँस गया था।”

उनका व्यावसायिक जीवन भी अनिश्चित होने लगा था। ऐसी स्थिति में वे परिवार और मित्रों से धन उधार लेने लगे। उनका भाई उनसे पूछता कि उन्हें धन की आवश्यकता क्यों पड़ रही है। इन प्रश्नों के कारण हिमांशु के भीतर चल रहा संकट धीरे-धीरे सामने आने लगा था।

वे कहते हैं, “मुझे पता था कि मुझमें सृजनात्मकता है। मुझे पता था कि मैं बहुत कुछ कर सकता हूँ और अपने जीवन में इससे कहीं अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता हूँ। लेकिन मैं उस दिशा में काम ही नहीं कर रहा था।”

वर्ष 2021-22 के आसपास उनके जीवन में एक संबंध ने भी महत्त्वपूर्ण मोड़ लिया। जब यह संबंध अंततः टूट गया, तो वे भावनात्मक रूप से अत्यंत व्याकुल हो गए। उनके मन में अपना व्यवसाय और अब तक का जीवन छोड़ देने के विचार आने लगे। उन्होंने कुछ महीनों के लिए वृंदावन जाने पर भी विचार किया। इसी बीच, उनके गृहनगर की एक महिला ने उन्हें बेंगलुरु स्थित संस्था के मुख्य केंद्र जाने और महाशिवरात्रि के अवसर पर सेवा करने का सुझाव दिया।

फरवरी 2023 में वे आर्ट ऑफ लिविंग के अंतरराष्ट्रीय केंद्र पहुँचे। उस समय भी वे धूम्रपान कर रहे थे और अपने टूटे हुए संबंध का भावनात्मक भार सँभालने का प्रयास कर रहे थे। प्रवेश के लिए हुई बातचीत में उन्होंने अपनी आदत के बारे में स्पष्ट रूप से बताया। जब उन्हें बताया गया कि आश्रम में धूम्रपान की अनुमति नहीं है, तो उन्होंने उत्तर दिया, “मुझे वास्तव में इसी कारण यहाँ आना है। मुझे इससे कुछ समय के लिए दूर होना है। मुझे इस आदत से बाहर निकलना है।”

हालाँकि, परिवर्तन तत्काल नहीं हुआ। लगभग तीन महीने तक वे धूम्रपान की आदत से संघर्ष करते रहे। ऐसा कोई चमत्कारिक क्षण नहीं आया, जब उनका व्यसन अचानक समाप्त हो गया हो। धीरे-धीरे सेवा, साधना और सुदर्शन क्रिया जैसी प्रभावशाली श्वास प्रक्रिया को अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करने से उनकी तलब कम होने लगी। अंततः उन्होंने धूम्रपान छोड़ दिया। वे इसे गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर के आशीर्वाद का परिणाम मानते हैं। आगे चलकर वे आर्ट ऑफ लिविंग के शिक्षक भी बने।

उनके जीवन में आया यह परिवर्तन इसलिए भी उल्लेखनीय था, क्योंकि इसे देखने वाले कुछ लोग वही मित्र थे, जिनके साथ उन्होंने धूम्रपान करना आरंभ किया था। जब हिमांशु ने अपने अतीत के बारे में सार्वजनिक रूप से बताने का निर्णय लिया, तो उन्हें चिंता थी कि उनके परिवार की प्रतिक्रिया कैसी होगी। परिवार को उनके धूम्रपान और मदिरापान के बारे में तो पता था, लेकिन गांजे के सेवन के बारे में जानकारी नहीं थी। उन्हें आशंका थी कि परिवार के लोग उनकी आलोचना करेंगे। इसके विपरीत, परिवार ने उन्हें आश्चर्यचकित कर दिया। उनकी कुछ बातों को सुनकर वे हँसे और उन्होंने हिमांशु से कहा कि उन्हें उन पर गर्व है।

हिमांशु की कहानी पंजाब में नशीले पदार्थों के सेवन की समस्या की पृष्ठभूमि में सामने आती है। उनकी जीवन यात्रा यह बताती है कि किस प्रकार निर्भरता धीरे-धीरे व्यक्ति की सोच, दृष्टि और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। हिमांशु के अनुसार, व्यसन ने उनकी दृष्टि को इतना सीमित कर दिया था कि जिस पदार्थ पर वे निर्भर होते जा रहे थे, वही उन्हें स्वतंत्रता का प्रतीक लगने लगा था।

वे कहते हैं, “जब हम किसी भी व्यसन में फँस जाते हैं, तो हमारी बुद्धि और दृष्टि बहुत सीमित हो जाती है।” गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर की शिक्षाओं को दोहराते हुए वे कहते हैं, “यदि स्वतंत्रता का आनंद लेने के लिए भी आपको किसी पदार्थ की आवश्यकता है, तो वास्तव में आप स्वतंत्र नहीं, बल्कि उसके बंधन में हैं।”

गुरुदेव कहते हैं, “मन का स्वभाव आनंद की खोज करना है। वह हर उस वस्तु की ओर बढ़ता है, जिसमें उसे क्षणभर के सुख की संभावना दिखाई देती है। इस खोज में वह कई बार ऐसे स्थानों पर आनंद तलाशने लगता है, जहाँ वह मिल ही नहीं सकता। इस प्रकार वह उन आदतों के जाल में फँस जाता है, जो सुख देने का वादा तो करती हैं, लेकिन उसे पूरा नहीं करतीं। संसार के सभी व्यसन आनंद का वादा करते हैं, लेकिन वे कभी उस वादे को पूरा नहीं करते।”

आज हिमांशु के लिए सुदर्शन क्रिया उस क्षणिक उत्तेजना से बिल्कुल भिन्न अनुभव का माध्यम है, जिसकी तलाश वे कभी नशीले पदार्थों में करते थे। वे कहते हैं, “इससे आपकी ऊर्जा बढ़ती है और सृजनात्मकता में सुधार होता है।” वे आगे कहते हैं, “मन में बहुत हल्कापन अनुभव होता है। मुझे लगता है कि मेरे भीतर बहुत कुछ है और मैं जीवन में बहुत कुछ कर सकता हूँ।”

आर्ट ऑफ लिविंग कई वर्षों से पंजाब में नशामुक्ति और नशे की रोकथाम के लिए कार्य कर रहा है। इस पहल के अंतर्गत जागरूकता, सामुदायिक सहभागिता, श्वास प्रक्रियाओं और निरंतर संपर्क के माध्यम से लोगों को व्यसन से बाहर निकलने की दिशा में सहायता दी जाती है।

पंजाब में संस्था की नशामुक्ति परियोजना वर्ष 2007 में आरंभ हुई थी। परियोजना की अवधि के दौरान गुरदासपुर, अमृतसर, होशियारपुर, जालंधर, फिरोजपुर, फरीदकोट, मोगा, संगरूर, पटियाला, फतेहगढ़ साहिब और बरनाला सहित अनेक जिलों के समुदायों तक इसकी पहुँच बनी। इस कार्यक्रम से हजारों लोगों को लाभ मिला।

वर्ष 2019 में पंजाब ही संस्था के देशव्यापी ‘नशामुक्त भारत अभियान’ के शुभारंभ का केंद्र बना। चंडीगढ़ में आयोजित इस अभियान में 25,000 विद्यार्थियों ने सहभागिता की।हिमांशु की यात्रा इस बात की ओर संकेत करती है कि व्यसन से बाहर निकलने का मार्ग केवल किसी आदत को छोड़ देने तक सीमित नहीं है। यह स्वयं को फिर से पहचानने, अपनी क्षमताओं पर विश्वास करने और जीवन को एक नई दिशा देने की प्रक्रिया भी है।

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