ख़बरिस्तान नेटवर्क : संसार का स्वभाव उथल-पुथल भरा है, लेकिन हमारी आत्मा का मूल स्वभाव शांति है। जब शरीर, मन और आत्मा एक साथ समरसता में होते हैं, तब व्यक्ति अपने भीतर सच्ची शांति का अनुभव करता है। अध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के अनुसार शांति का अर्थ जीवन से भागना या परिस्थितियों को चुपचाप स्वीकार कर लेना नहीं है। निष्क्रियता को शांति समझ लेना एक बड़ी भूल है। जीवन में अन्याय या संघर्ष के सामने आक्रामक हुए बिना अपने आचरण में सौम्यता और दृढ़ता बनाए रखना ही वास्तविक शांति है।
कमल के फूल की तरह अनासक्त जीवन जीने की कला
इस संसार में रहते हुए भी उससे पूरी तरह असंपृक्त रहना ही जीवन का वास्तविक कौशल है। जिस प्रकार कमल का फूल कीचड़ में खिलने के बावजूद उससे अछूता रहता है और जल की बूंदें उसके पत्ते पर टिकती नहीं, उसी प्रकार मनुष्य को संसार में पूरी सक्रियता के साथ मौजूद रहते हुए भी भीतर से अनासक्त रहना चाहिए। जब व्यक्ति जीवन में आने वाले द्वंद्वों और संघर्षों को सहजता से स्वीकार कर लेता है, तो वे संघर्ष धीरे-धीरे स्वतः ही समाप्त होने लगते हैं।
संवाद का अभाव और निश्चितता का आग्रह ही विवादों की जड़
अधिकतर विवादों में दोनों पक्षों को लगता है कि वे सही हैं। किसी भी संघर्ष को सुलझाने के लिए केवल सही साबित होना काफी नहीं होता, बल्कि आपसी विश्वास और निरंतर संवाद बनाए रखना बेहद जरूरी है। जब संवाद टूटता है, तब विवाद गहरे हो जाते हैं। इसके अलावा स्वयं को पूरी तरह सही मानने और हर चीज़ में निश्चितता चाहने की प्रवृत्ति व्यक्ति में क्रोध को जन्म देती है। जब परिस्थितियाँ अपेक्षाओं के विपरीत होती हैं, तो मन विचलित हो जाता है।
अनिश्चितता को स्वीकार करने से बढ़ता है जीवन का रोमांच
जैन दर्शन का ‘स्यादवाद’ सिद्धांत हमें सिखाता है कि जीवन में सब कुछ अनिश्चित और परिवर्तनशील है। जब हम अनिश्चितता को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं, तो क्रोध, तनाव और कठोरता के बंधन से मुक्त होने लगते हैं। निश्चितता जहाँ एक सुरक्षा का अहसास देती है, वहीं अनिश्चितता जीवन में नया रोमांच, सृजनशीलता और श्रद्धा जगाती है। भीतर से स्थिर और बाहर से सजग रहकर ही व्यक्ति अपने आसपास के माहौल में भी शांति का प्रसार कर सकता है।









