देवी हमसे दूर नहीं हैं-श्री श्री रविशंकर

देवी न तो हमसे दूर हैं और न ही उन्हें पाना कठिन है। नवरात्रि अपने भीतर और समस्त सृष्टि में दिव्यता को पहचानने का उत्सव है। भारत भर में नवरात्रि गरबा, दुर्गापूजा, सजावटी झाँकियों और व्रत-उपवास के साथ मनाई जाती है।

ख़बरिस्तान नेटवर्क : देवी न तो हमसे दूर हैं और न ही उन्हें पाना कठिन है। नवरात्रि अपने भीतर और समस्त सृष्टि में दिव्यता को पहचानने का उत्सव है। भारत भर में नवरात्रि गरबा, दुर्गापूजा, सजावटी झाँकियों और व्रत-उपवास के साथ मनाई जाती है। दिव्यता सर्वत्र विद्यमान है, लेकिन वह सुप्त अवस्था में रहती है। पूजा उसे जागृत करने की प्रक्रिया है। लोग अपने घरों में विधि-विधान से पूजा-अर्चना और प्रार्थना करते हैं। हम उपवास ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए नहीं, बल्कि अपने शरीर को शुद्ध करने के लिए रखते हैं। उपवास से शरीर का विषहरण होता है और हमारी प्रार्थना अधिक सच्ची तथा गहन बन जाती है।

देवी हम सभी के भीतर विभिन्न अनुभवों के रूप में प्रकट होती हैं-भूख, नींद, क्रोध आदि के रूप में। किसी व्यक्ति में दिखाई देने वाली तेजस्विता भी देवी की ही अभिव्यक्ति है। यदि कोई व्यक्ति भ्रमित है, तो उसका भ्रम भी उसी ऊर्जा की अभिव्यक्ति है। बुद्धि, प्रतिभा और करुणा के रूप में अथवा किसी भी भाव और अनुभूति में, अंततः वही एक ऊर्जा विद्यमान है। सजावटी प्रकाशमाला में अनेक बल्ब होते हैं। वे देखने में अलग-अलग हैं, लेकिन उन सभी को प्रकाशित करने वाली विद्युत एक ही है। इस सत्य को जान लेने पर मन शांत हो जाता है।

फिर देवी हमसे इतनी दूर क्यों प्रतीत होती हैं? हम जो कुछ भी करते हैं, उसका परिणाम हमारी अपनी क्षमता से बड़ा नहीं होता। लेकिन जो हमें बिना किसी प्रयास के, केवल कृपा और आशीर्वाद से प्राप्त होता है, वह कहीं अधिक विशाल होता है। इस उत्सव का सार भी यही है-बस उस कृपा को ग्रहण करना। ध्यान में बैठिए, मंत्रों को सुनिए और उस ऊर्जा को अनुभव कीजिए। मक्का का दाना बहुत कठोर होता है, लेकिन उसे थोड़ी-सी आँच मिलते ही वह खिलकर पॉपकॉर्न बन जाता है। इसी प्रकार, चेतना सर्वव्यापी है और मंत्रों के उच्चारण से उसमें प्रस्फुटन होता है, वह खिल उठती है और स्वयं को प्रकट करती है।

आशीर्वाद ग्रहण करने में सबसे बड़ी बाधा हमारा सीमित मन है। मन द्वैत में जीता है। उसमें विश्वास और संदेह, सुख और दुःख, जुड़ाव और अलगाव, सब साथ-साथ चलते हैं। यह चंचल मन निरंतर विचार करता है, निर्णय सुनाता है और भेदभाव करता है। छोटी-छोटी बातें भी हमारा ध्यान भटका सकती हैं।

पास बैठे किसी व्यक्ति का छींकना, खाँसना या इधर-उधर हिलना-डुलना भी हमें विचलित कर सकता है। जब ऐसा कोई विचार आए, तो स्वयं से कहें, “यह केवल मन है। पाँच मिनट पहले मैं विचलित हुआ था, लेकिन उस बात को अब इस क्षण में अपने साथ नहीं रखना चाहता।” जब विशाल चेतना सीमित मन पर विजय प्राप्त करती है, वही देवी शक्ति है। बस सहज होकर रहें। जब आप बिना किसी प्रयास के केवल वर्तमान में स्थित होते हैं, तो अपने भीतर उस ऊर्जा को अनुभव करने लगते हैं।

भक्ति में पूरी तरह डूब जाइए, क्योंकि चेतना को आपका निःशर्त प्रेम प्रिय है। प्राचीन ऋषियों ने देवी-देवताओं को कमल पर विराजमान दिखाया। ईश्वर कमल पर खड़े नहीं हैं। कमल पर कोई खड़ा नहीं हो सकता, सिवाय भौंरे के। इसका गहरा अर्थ है कि जब हमारी चेतना कमल की भाँति कोमल, सुंदर और पूर्ण रूप से विकसित हो जाती है, तब उसमें दिव्यता का निवास होता है। तभी लक्ष्मी, दुर्गा और सरस्वती उसमें विराजती हैं।

आदिशक्ति सहस्रदल कमल में निवास करती हैं। हमारा मस्तिष्क ही सहस्रदल कमल के समान है। जब हमारे मस्तिष्क की प्रत्येक कोशिका कमल की भाँति खिल उठती है, तब मातृशक्ति पहले से ही हमारे भीतर विद्यमान होती हैं। दिव्यता को खोजने के लिए आपको कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है। दिव्यता अत्यंत सूक्ष्म होते हुए भी सर्वव्यापी है।

नवरात्रि का अर्थ है नौ रातें और ‘रात्रि’ का अर्थ है गहन विश्राम। गहरा विश्राम आपको सभी चिंताओं और परेशानियों से मुक्त कर सकता है। ध्यान में मिलने वाला विश्राम गहरी से गहरी नींद से भी अधिक गहन होता है। इसके लिए आवश्यक है कि आप हर परिस्थिति को पूरी तरह स्वीकार करें और स्वयं को पूर्ण विश्राम में छोड़ दें। आप पाएँगे कि देवी यहीं हैं, इसी क्षण, आपके भीतर।

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