विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस : यदि दयालुता हमारा स्वभाव है, तो हिंसा कहां से आती है?

हर व्यक्ति का स्वाभाविक स्वरूप दयालु, प्रेमपूर्ण, करुणामय और आनंदमय होता है। कोई भी बच्चा बिना कारण नहीं रोता। वह तब रोता है, जब उसे भूख लगी हो, नींद आ रही हो या वह भयभीत हो।

हर व्यक्ति का स्वाभाविक स्वरूप दयालु, प्रेमपूर्ण, करुणामय और आनंदमय होता है। कोई भी बच्चा बिना कारण नहीं रोता। वह तब रोता है, जब उसे भूख लगी हो, नींद आ रही हो या वह भयभीत हो। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति हिंसक है, तो उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। यदि किसी में करुणा का अभाव है, तो उसके पीछे भी कोई कारण है। और यदि हम वास्तव में उसकी जड़ तक जाएँ, तो वहाँ हमें अकेलापन, भय, अस्वीकृति की भावना और अपनेपन के अभाव का अनुभव मिलेगा।

जब कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से बीमार होता है, तो हम उसे अस्पताल भेजते हैं। जब उसके व्यवहार में विकृति आ जाती है, तो हम उसे जेल भेज देते हैं। लेकिन जेल जाने के बाद भी हम उसे ऐसे साधन और तकनीकें नहीं देते, जिनसे वह अपने व्यवहार को सुधार सके और अपनी भावनाओं को समझकर उनमें परिवर्तन ला सके।

आज दुनिया में होने वाली आधी से अधिक हिंसा के पीछे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियाँ हैं। मानसिक स्वास्थ्य आज विश्व के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। विकासशील हो या विकसित देश, युद्धग्रस्त क्षेत्र हो या शांतिपूर्ण समाज—यह हम सभी को प्रभावित करता है। यह अत्यंत चिंताजनक है कि हर 42 सेकंड में एक व्यक्ति अपना जीवन समाप्त कर रहा है। असंख्य युवा या तो आक्रामक और हिंसक होते जा रहे हैं या फिर अवसाद में जा रहे हैं। भारत अपनी आध्यात्मिक परंपरा के माध्यम से इस मानसिक स्वास्थ्य संकट से निपटने में विश्व की बड़ी सहायता कर रहा है।

सामान्यतः न तो घर में और न ही विद्यालय में हमें अपनी भावनाओं को संभालना सिखाया जाता है। कभी-कभी अकेलापन महसूस करना स्वाभाविक है; धन, परिवार और मित्र होने पर भी व्यक्ति भीतर से उदास या अकेला अनुभव कर सकता है। आज मानसिक स्वास्थ्य के एक बड़े संकट के रूप में सामने आ रहा यह अकेलापन इसलिए है, क्योंकि हमने स्वयं के साथ रहना और अपने भीतर शांत रहना सीखा ही नहीं है। यदि हम यह सीख लें, तो हमारे भीतर का आनंद हमारे आसपास के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचने लगेगा।

यहाँ हमारी श्वास स्वस्थ मन की कुंजी है। स्वस्थ मन के क्या लक्षण हैं? आपके चेहरे पर ऐसी मुस्कान, जिसे कोई आपसे छीन न सके; और अपने भीतर ऐसा आत्मविश्वास कि आप किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं। स्वस्थ मन वह है, जो आलोचना को स्वीकार कर सके और स्वस्थ एवं रचनात्मक आलोचना करने का साहस भी रखे। यह निर्भय होने के साथ-साथ विनम्र बने रहने की क्षमता है।

हर भावना शरीर के किसी न किसी विशेष हिस्से में विशिष्ट संवेदनाएँ उत्पन्न करती है। इसका संबंध हमारी श्वास से भी है। जब हम उदास होते हैं, तब हमारी श्वास का ढंग अलग होता है और जब हम प्रसन्न होते हैं, तब उसका ढंग अलग होता है।

जब आप क्रोधित, निराश या ईर्ष्यालु होते हैं, तो अक्सर समझ नहीं आता कि उन भावनाओं के साथ क्या किया जाए और हम उन्हें भीतर ही पकड़े रहते हैं। लेकिन आपकी श्वास आपसे जैसे कह रही होती है-“मैं दिन-रात तुम्हारे भीतर आती-जाती रहती हूँ। यदि तुम मुझे थोड़ा-सा ध्यान दे दो, तो मैं तुम्हें प्रसन्न रखूँगी, तुम्हारी आत्मा को ऊर्जावान और प्रसन्नचित्त रखूँगी तथा तुम्हारी ऊर्जा को जीवंत बनाए रखूँगी।”

दुनिया भर में करोड़ों लोगों ने सरल श्वास तकनीकों और ध्यान को अपनाया है और उनके जीवन में परिवर्तन आया है। उदाहरण के लिए, सुदर्शन क्रिया ने अनेक लोगों को निराशा और चिंता से उबरने में सहायता की है। ये तकनीकें हमें अपने मन के स्वामी बनना सिखाती हैं, न कि अपने ही मन का शिकार बने रहना।

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