तुलसी गौड़ा पेड़-पौधे लगाकर लोगों को हेल्दी रखने में करती है मदद, मिला पद्मश्री सम्मान



कर्नाटक की आदिवासी महिला तुलसी गौड़ा 6 दशकों में लगा चुकी हैं 30,000 से ज्यादा पेड़ पौधे

वेब खबरिस्तान।  कहते हैं किसी भी काम को बिना किसी लालच के करना, यानि की निस्वार्थ होकर करने से उसका फल कभी न कभी जरूर मिलता ही है कुछ ऐसा ही किया है कर्नाटक के छोटे से गांव में रहने वाली एक आदिवासी महिला ने। इस आदिवासी महिला का नाम है तुलसी गौड़ा जो पिछले 6 दशकों से पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रही हैं। इतना ही नहीं वह अब तक 30,000 से अधिक पेड़-पौधे लगा चुकी हैं। पेड़- पौधों के प्रति उनके इसी त्याग और भावना को देखते हुए सरकार की तरफ से उनको पद्म श्री सम्मान से नवाजा गया है। हाल ही में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्म पुरस्कारों का ऐलान किया था। जिसमे राष्ट्रपति ने कर्नाटक की महिला तुलसी गौड़ा को पद्म श्री अवार्ड दिया। तुलसी के बारे में बात करने से पहले आपको बता दें कि कैसे कोरोना काल में लोगों ने अपनी इम्युनिटी को स्ट्रोंग करने के लिए बहुत से पेड़ पौधों की महत्ता को समझा है।

कोरोना काल में समझ आई पेड़ पौधों की महत्ता   

पिछले साल कोरोना संकट के दौर में देश के लोगों को अपने शरीर की इम्युनिटी बढ़ाने के लिए तुलसी, अदरक, काली मिर्च और गिलोई आदि पेड़ पौधों का सही महत्व बहुत अच्छे से समझ आ चूका है। बहुत से लोगों ने कोरोना संकट के दौरान इन चीजों से बना काढ़ा पीकर कोरोना वायरस से खुद को बचाने में काफी सफलता हासिल भी की थी। इसके साथ ही ऑक्सीजन के संकट की वजह से लोगों को पर्यावरण संरक्षण का महत्व और भी ज्यादा समझ आ चूका है।

बहुत से अवार्ड मिल चुके हैं तुलसी को


लोगों से स्वास्थ्य के लिहाज से मददगार पौधे लगाकर तुलसी अपने एरिया लोगों को बीमारियों से बचाने में बहुत ही अहम भूमिका निभा रही हैं। आपको बता दें पद्मश्री से पहले तुलसी को ‘इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र अवार्ड, राज्योत्सव अवार्ड और ‘कविता मेमोरियल जैसे बहुत से  पुरस्कार सम्मान मिल चुके हैं। आज भी वह कई पौधों के बीज जमा करने के लिए खुद वन विभाग की नर्सरी तक पहुंचती हैं और अगली पीढ़ी को भी यही संस्कार देना चाहती हैं। तुलसी गौड़ा का कहना है ‘हम कई पौधों के बीज को जमा कर गर्मियों के मौसम तक उनका रखरखाव करते हैं और फिर जंगल में उस बीज को बोते आते हैं’।

पिछले 60 सालों से कर रही हैं पर्यावरण को संभालने का काम

आपको बता दें तुलसी गौड़ा कर्नाटक के छोटे से होनाली गांव की रहने वाली हैं। आपको शायद जानकर हैरानी होगी कि तुलसी कभी भी स्कूल नहीं गईं। इतना ही नहीं उन्हें पेड़-पौधों और जड़ी-बूटियों का ऐसा ज्ञान है कि उन्हें ‘इनसाइक्लोपीडिया ऑफ फॉरेस्ट’ के नाम से भी जान जाता है। तुलसी गौड़ा पिछले 6 दशकों से पर्यावरण संरक्षण के काम में बिना किसी स्वार्थ के जुटी हुई हैं। इसी निस्वार्थ सेवा को देखते हुए तुलसी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा पद्म श्री सम्मान दिया गया है। पेड़-पौधों से तुलसी गौड़ा का रिश्ता इतना गहरा है की वह आँख बंध करके भी बता सकती है की कौन सा हमारी बॉडी के लिए सही है।

20 साल की थी जब पेड़-पौधों से हुआ लगाव

तुलसी के मुताबिक उन्होंने 20 साल की उम्र में पेड़-पौधों को अपनी ज़िंदगी में शामिल किया था। तुलसी गौड़ा ने कहा, ‘मैंने यहां तब काम करना शुरू किया, जब मैं 20 साल की थी। मेरी शादी शायद 12 साल की उम्र में हो चुकी थी, मुझे ठीक से याद नहीं है। जब 3 साल की थी, तभ पिता इस दुनिया से चल बसे थे।

सभी को भा गयी तुसली की सादगी

चाहे आप हो या हम, कहीं भी जाना हो तो खुद को इतना तैयार करते हैं की सामने वाला देख कर मुहं न बनाये। कहने का मतलब है कि किसिस फंक्शन में जाना हो तो कपड़ों से लेकर हर चीज का बहुत ज्यादा ही ध्यान रखते है। लेकिन अगर बात करें तुसली गौड़ा की तो वह इतनी सादगीपूर्ण हैं, इसका अंदाजा सम्मान समारोह की तस्वीरों को देख कर लगाया जा सकता है। आपको बता दें तुलसी गौड़ा ने कपड़े के नाम पर साधारण कपड़े पहने हुए थे। गले में आदिवासी जीवनशैली से जुड़ी कुछ मालाएं डाली हुई थी। इतना ही नहीं वह बिना चप्पल के यानि नंगे पैर पद्मश्री सम्मान लेने आईं थी।

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