महावर को सोलह श्रृंगार का हिस्सा क्यों मानते है, जानें



पैरों में महावर लगाने से स्ट्रेस दूर होता है, इसके बिना देवी की मूर्ति भी इसके अधूरी मानी जाती है

खबरिस्तान नेटवर्क: भारत देश में हिंदू मान्यताओं में महावर यानी आलता को सोलह श्रृंगार का ही हिस्सा मना गया है। इसे महिलाएं अपने पैरों पर लगाती हैं। बता दें कि नवरात्रों में जब छोटी बच्चियों को देवी के रूप में पूजा जाता है, तो उन्हें महावर जरूर लगाया जाता है। तो आईये इससे जुड़ी कुछ खास बातें जानते है।

लाल रंग का महावर होता है शुभ

लाल रंग के महावर को बहुत ही शुभ माना जाता है। भारत देश के कई जगहों पर दुल्हन जब पहली बार ससुराल आती है तो गृह प्रवेश की रस्म के अनुसार वो लाल महावर से घर के अंदर बढ़ते कदमों की छाप छोड़ती है। इसे धन लाभ और लक्ष्मी के वास से जोड़ जाता है।

तीज त्यौहार में लगाने का महत्व


कई राज्यों में महिलाएं इसे तीज-त्योहारों पर जरूर लगाती हैं। इसके अलावा पूजा या शुभ कार्य के लिए भी इसे लगाना शुभ माना गया है। बता दें कि बहुत सी मान्यताओं के अलावा अगर इसे नेचुरल तरीके से तैयार कर के लगाया जाए तो एड़ियों को ठंडक मिलती है, जिससे स्ट्रेस दूर होता है।

किसानी करने वाली महिलाएं क्यों लगाती हैं

इसके पीछे पुराणी प्रथा चली आ रही है। जब बारिश का मौसम होता है तो ग्रामीण क्षेत्रों में किसानी करने वाली महिलाएं खेत में जाने से पहले महावर जरूर लगा कर जाती हैं। पूर्वांचल और यूपी के कुछ ग्रामीण इलाको में माना जाता है कि खरीफ सीजन में धान की निराई, गोड़ाई और रोपाई के दौरान महिलाएं घंटों खेतों में काम करती हैं, जिससे उनकी एड़ियां और तलवे फटने का डर रहता हैं। ऐसे में इससे बचने के लिए महिलाएं महावर लगाती हैं ताकि वो अपने पैरों की त्वचा को खराब होने से बचा सकें।

स्ट्रेस को कम करने में भी कारगर

भारत में महावर लगाने का चलन बंगाल, बिहार, झारखंड ओडिशा में सबसे अधिक है। आलता मूल रूप से एक बंगाली शब्द है। हिन्दी में इसे महावर कहते हैं। पुराने समय मे आलता कच्ची लाख और पान को पीस कर उसे पानी में पका कर तैयार किया जाता था। जिसे लगाने से एड़ियों को ठंडक मिलती है और ये तनाव को दूर करता है।

बहुत सी अन्य मान्यताएं हैं

महावर को लेकर एक कहावत प्रसिद्ध है, जिसमें कहा जाता है कि पुराने समय में जब महावर लगे पैर से सुंदर महिलाएं अशोक वृक्ष के चारों तरफ घूमती थी तो उस पर कलियां खिल जाती थी, जिसे वसंत आने का संकेत माना जाता था। आज भी कई राज्यों में खास करके बिहार बंगाल और ओडिशा में महावर के बिना दुल्हन का श्रृंगार अधूरा माना जाता है। बंगाल और ओडिशा में तो दुल्हन के हाथों में महावर लगाया जाता है।

देवी की शृंगार पूजा में भी रखा जाता है

बता दें कि देवी के लिए गाए गए कई भक्ति गीतों में भी लाल महावर का जिक्र होता आया है। देवी की शृंगार पूजा में भी इसे जरूर रखा जाता है। इसके बिना देवी की मूर्ति भी अधूरी मानी जाती है। देश में बेटियों को लक्ष्मी का रूप माना गया है  इसलिए कई लोग बेटी के पैदा होने पर उसके नन्हें पैरों को महावर में डुबो कर उसके छाप लेते हैं और उसे संभाल कर रखते हैं।

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