मास्टर मदन पुण्य तिथि 5 जून: प्रतिभाशाली ग़ज़ल और गीत गायक थे जालंधर के मास्टर मदन, 14 साल की उम्र में हुई मौत



मास्टर मदन को आकाशवाणी और अनेक रियासतों के दरबार में गाने के लिए मिलती थी बहुत ऊँची रकम

खबरिस्तान नेटवर्क: भारत के जालन्धर शहर का रिश्ता गायकी से बहुत पुराना जुड़ा हुआ है। आजादी से पहले भी इस शहर के काफी गायक अपनी गायकी से लोगों का मनोरंजन किया करते थे। बता दें ऐसे ही एक कलाकार थे मास्टर मदन, जिनके बारे में बहुत कम लोगों को मालूम है। बता दें मास्टर मदन प्रतिभाशाली ग़ज़ल और गीत गायक थे। तो चलिए आज इनके बारे में जानते हैं।

ग़ज़ल गायकी के लिए हुए मशहूर

मास्टर मदन जालंधर शहर के खानखाना गांव में 28 दिसम्बर 1927 को पैदा हुए थे। बता दें इस गाँव के नाम की कहानी भी काफी दिलचस्प है। कहते हैं कि इस गाँव की खोज अकबर के नवरत्न अब्दुल रहीम खानखाना द्वारा की गई थी। उन्हीं के नाम पर इस गाँव का नाम पड़ा। मास्टर मदन भारत की आज़ादी से पहले के एक प्रतिभाशाली ग़ज़ल और गीत गायक थे। मास्टर मदन एक ऐसे कलाकार थे जो 1930 के दशक में एक किशोर के रूप में ख्याति प्राप्त करके मात्र 14 वर्ष की उम्र में 1940 के दशक में इस दुनिया को अलविदा कह गये। लेकिन वे अपने पीछे अपने द्वारा गाई हुई कुछ गज़लें छोड़ गये जिन्हें आज भी बहुत से लोग सुना करते हैं।

महज साढ़े तीन साल की उम्र में शुरू किया था गाना

यूं तो जानकर हैरानी होगी कि मास्टर मदन ने साढ़े तीन साल की उम्र में अपना पहला पब्लिक परफॉर्मेंस दिया था। 1930 के आस पास इस कार्यक्रम का आयोजन हिमाचल प्रदेश में हुआ था। हिमाचल प्रदेश के जिस शहर में ये कार्यक्रम हुआ वे मास्टर मदन के गाँव से ज्यादा दूर नहीं था। लिहाजा इतनी कम उम्र में उन्हें वहां जाने और कार्यक्रम करने की इजाजत मिल गई। कहते हैं कि उस कार्यक्रम के बाद लोग उनकी आवाज और अदायगी के दीवाने हो गए। इतनी कम उम्र के बच्चों को इस तरह गाते हुए कभी किसी ने सुना ही नहीं था। लिहाजा मास्टर मदन पर ईनामों की बरसात हुई। ईनाम भी ऐसा वैसा नहीं, उन्हें इनाम में शॉल, सोने की अंगूठी वगैरह मिलीं।

गाने के लिए मिलती थी ऊँची रकम


बता दें कि मास्टर मदन को आकाशवाणी और अनेक रियासतों के दरबार में गाने के लिए बहुत ऊँची रकम मिलती थी। मास्टर मदन उस समय के प्रसिद्ध गायक कुंदन लाल सहगल के बहुत करीबी थे जिसका कारण दोनों का ही जालंधर का निवासी होना माना जाता था।

8 नगमें ही हुए थे रिकॉर्ड

अब भला क्या आप सोच सकते हैं कि हिंदुस्तानी संगीत में एक ऐसा भी कलाकार हुआ जिसके सिर्फ 8 नगमें ही रिकॉर्ड हुए थे और वो उन्हीं आठ नगमों के दम पर अब भी लाखों संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करता है। यूं तो कोई भी ये बात दावे से नहीं कह सकता कि मास्टर मदन ने कितने गाने गाए। लेकिन ये बात तय है कि रिकॉर्ड 8 ही हुए थे। बता दें उस कलाकार की मौत हिंदुस्तान की आजादी से काफी पहले ही हो गई थी यानि आठ दशक से भी पहले। लेकिन आज भी उस कलाकार को हम उसके उन्हीं 8 नगमों की वजह से जानते हैं और याद भी करते हैं।

दो गज़ले हुई काफी मशहूर

बता दें कि मास्टर मदन के रिकॉर्ड हुए दो गाने आज भी आसानी से आपको सुनने के लिए मिल जायेंगे। इनमें से सबसे लोकप्रिय ग़ज़ल को 1935 में रिकॉर्ड किया गया था। ग़ज़ल लिखने वाले शायर थे सागर निज़ामी। इस ग़ज़ल के शेर कुछ इस तरह हैं।

यूं ना रह रह के हमें तरसाइए/

आइए, आ जाइए, आ जाइए/

इस ग़ज़ल के अलावा ‘हैरत से तक रहा है जहाने वफा मुझे’ ग़ज़ल भी काफी मशहूर हुई। इन दो गजलों के अलावा रिकॉर्ड किए हुए नगमों में मास्टर मदन के दो पंजाबी गीत भी शामिल हैं, दो ठुमरियां हैं और दो गुरबानी। ‘गोरी गोरी बहियां’ और ‘मोरी बिनती मानो कान्हा रे’ उनकी ठुमरियों के बोल हैं।

मदन गाने के लिए देश के कई हिस्सों में गया

बता दें कि मास्टर मदन छोटी सी उम्र में इतने फेमस  हो चुके थे कि लोग उनको देखने और उनसे मिलने के लिए बेताब रहने लगे। इसी के चलते मदन देश के अलग अलग हिस्सों में गाने के लिए जाते। महज सात साल की उम्र में उन्होंने पंडित अमरनाथ से सीखना शुरू किया। पंडित अमरनाथ मशहूर संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम के बड़े भाई थे। जिन दो ग़ज़लों का जिक्र हमने आपको पहले बताया उसका संगीत पंडित अमरनाथ ने ही दिया था। ये सोचकर भी ताज्जुब होता है कि आठ साल की उम्र में मास्टर मदन रेडियो के लोकप्रिय गायक बन चुके थे।

आखिरी परफॉरमेंस कलकत्ता में हुआ

14 साल की उम्र में उनका आखिरी ‘पब्लिक परफॉर्मेंस’ कलकत्ता में हुआ। इसके बाद वो दिल्ली आए। उनके नाम की तब तक धूम मच चुकी थी। कलकत्ता से लौटने के बाद मास्टर मदन ने तीन-चार महीने ही और गाया होगा कि अचानक उनकी तबियत बिगड़ने लगी। वो शिमला चले गए। जहां उनके माथे और जोड़ों पर अजीब सी चमक दिखाई देने लगी। कोई इलाज काम नहीं आया। आखिरकार 5 जून 1942 को करीब चौदह साल की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी मौत पर शिमला को बंद रखा गया। पदक पहने हुए ही मास्टर मदन का अंतिम संस्कार किया गया।

आज भले ही उनकी पुण्य तिथि हो, लेकिन उनकी ग़ज़लों की गूंज हमेशा संगीतप्रेमियों के कानों में गूंजती रहेंगी।

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