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पहली बार एस्टेरॉयड और स्पेस क्राफ्ट की टक्कर पृथ्वी को बचाने का एक्सपेरिमेंट सफल

पहली बार एस्टेरॉयड और स्पेस क्राफ्ट की टक्कर, पृथ्वी को बचाने का एक्सपेरिमेंट सफल

नासा इस टेस्ट के जरिए यह देखना चाहता था कि क्या धरती की तरफ आ रहे किसी एस्टेरॉयड की दिशा को बदला जा सकता है या नहीं।


कल है विश्वकर्मा जयंती, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त

कल है विश्वकर्मा जयंती, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त

खबरिस्तान नेटवर्क। विश्वकर्मा जयंती अश्विन माह की कन्या संक्रांति को मनाई जाती है। देश में इस साल 17 सितंबर 2022 यानी शनिवार को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान श्री विश्वकर्मा की पूजा के साथ-साथ घर, ऑफिस में औजारों की भी पूजा की जाती है। मान्यताओं के अनुसार ऐसा करने से नौकरी, व्यापार में काफी तरक्की होती है और विशेष फल की भी प्राप्ति होती है। जानिए क्या है श्री विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त। श्री विश्वकर्मा पूजा करने का शुभ मुहूर्त पूजा करने का शुभ मुहूर्त सुबह 07:36 से रात 09:30 बजे तक है। वहीं, अभिजीत मुहूर्त- सुबह 11:51 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक है। इसके अलावा भगवान विश्वकर्मा की पूजा राहुकाल में नहीं करनी चाहिए। त्रिशुल और सुदर्शन चक्र के निर्माता हैं भगवान विश्वकर्मा मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के अस्त्र जैसे त्रिशुल, सुदर्शन चक्र आदि का निर्माण किया था। इसके अलावा उन्होंने ही पुष्पक विमान और कई महलों का निर्माण किया था। वहीं, ब्रह्म देव ने संसार की रचना करने के बाद उसे सुंदर बनाने की जिम्मेदारी विश्वकर्मा कौ सौंपी थी। विश्वकर्मा पूजा की विधि विश्वकर्मा पूजा के दिन सबसे पहले सुबह उठकर स्नान करें। इसके बाद साफ कपड़े पहनें। इसके साथ पूजा के स्थान पर गंगाजल छिड़कें और उसे साफ करें। एक चौकी लें और पीले रंग का कपड़ा बिछाएं। इस चौकी पर लाल रंग के कुकुम से स्वास्तिक बनाएं। भगवान गणेश का ध्यान करें। उन्हें प्रणाम करें और स्वास्तिक पर फूल को अर्पण करें। भगवान विष्णु और मुनि विश्वकर्मा की प्रतिमा पर तिलक लगाएं और मन ही मन उनका स्मरण करें। इसके बाद विश्वकर्मा जी के मंत्र ओम आधार शक्तपे नम: और ओम् कूमयि नम:; ओम् अनन्तम नम:, पृथिव्यै नम: का 108 बाद जाप करें। विश्वकर्मा पूजा के बाद भगवान विष्णु और विश्वकर्मा जी की आरती करें और फल-मिठाई का भोग लगाएं। पूजा में आपको सुपारी, रोली, पीला अष्टगंध चंदन, हल्दी, लौंग, मौली, लकड़ी की चौकी, पीला कपड़ा, मिट्टी का कलश, नवग्रह समिधा, जनेऊ, इलायची, कपूर, देसी घी, हवन कुण्ड, आम की लकड़ी, दही, फूल, इत्र, सूखा गोला, जटा वाला नारियल, धूपबत्ती, अक्षत, धूप, फल, मिठाई की जरूरत होगी। पूजा खत्म होने के बाद सभी को प्रसाद जरूर बांटे।

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Copenhagen Metro में ले जा सकते हैं साइकिल, जानें किस तरह

Copenhagen Metro में ले जा सकते हैं साइकिल, जानें किस तरह

खबरिस्तान नेटवर्क: बता दें कि डेनमार्क (Denmark) की राजधानी कोपेनहेगेन (Copenhagen) शहर पूरी दुनिया में अपने साफ़ सफाई के लिए काफी फेमस है। यहां के लोग रोजमर्रा के काम में ज्यादा से ज्यादा साइकिल (Cycle)का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए ज्यादा हेल्दी रहते हैं। बता दें कि कोपेनहेगेन की मेट्रो ट्रेन में सफर करने वाले अपने साथ साइकिल (Copenhagen Metro allows Cycle) लेके जा सकते हैं। भारत में भी इस तरह के चलन की शुरुआत धीरे-धीरे हो रही है। तो चलो आपको ब्तातेह अं कि डेनमार्क की मेट्रो ट्रेन में साइकिल ले जाने की शुरुआत कैसे हुई। कोरोना काल के बाद हुई इसकी शुरुआत Corona काल में दुनिया के बहुत से देशों के लोगों ने खुद को सेहतमंद रखने के लिए साइकिल की सवारी करना शुरू कर दिया। इससे न सिर्फ पैसे की बचत होती है बल्कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट (Public transport) का सहारा भी नहीं लेना पड़ता। वहीं डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन की बात करें तो कोपेनहेगेन मेट्रो () में काफी समय से मेट्रो ट्रेन को साथ ले जाने की इजाजत है। मेट्रो के साथ साइकिल को मंजूरी देने के फैसले की वजह खुद डेनमार्क की सरकार और वहां के शहरों के प्रशासनिक अधिकारी बताते हैं। क्या कहते हैं इस शहर के प्रशासनिक अधिकारी डेनमार्क के प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक ऐसा करने से एक तो देश में प्रदूषण काफी हद तक कंट्रोल में रहता है तो दूसरी ओर लोग फिजिकली फिट भी रहते हैं। कोपेनहेगेन के स्थानीय लोगों की बात करें तो वो भी इस चेंज से काफी खुश हैं और सरकार की राय में पूरी तरह से शामिल हैं। कोरोना काल की बंदिशे खत्म होने के बाद डेनमार्क समेत दुनियाभर के देशों में मेट्रो और लोकल ट्रेन सर्विस के फेरों को बढ़ाया गया है। ऐसे में यहां के लोग अपनी शान की सवारी यानी साइकिल (Cycle) के साथ मेट्रो ट्रेन के अंदर बड़े गर्व के साथ दाखिल होते हैं। मेट्रो में चड़ने के लिए कोई हड़बड़ी नही यहां के लोग बड़े अनुशासन के साथ ट्रेन में चढ़ने और उतरने के लिए किसी तरह की हड़बड़ी और जल्दबाजी नहीं करते हैं। लोग ट्रेन के अंदर बड़े सलीके से एक साइकिल स्टैंड की तरह अपनी साइकिल खड़ी करते हैं और अपना स्टेशन आने पर उतर जाते हैं। ऐसा करते समय वो ध्यान रखते हैं कि उनकी वजह से किसी को किसी भी तरह की तकलीफ तो नहीं हो रही। हर स्टेशन पर मिल जाती है साइकिल कोपेनहेगेन मेट्रो के लगभग हर स्टेशन पर साइकिलें आसानी से मिल जाती हैं। यहां रेंट पर साइकिल मिलने का काफी चलन है। वहां के मेट्रो स्टेशनों के बाहर भी बहुत से लोग अपनी साइकिल पार्क करके जाते हैं। वहीं ये लोग शाम को लौटते समय अपनी साइकिल निकालकर उसे चलाते हुए घर जाते हैं। शहर में साइकिलिंग को बढ़ावा देना है कोच्चि मेट्रो की बात करें तो इस फैसले से यात्रियों को मेट्रो में सफर के बाद यहां-वहां जाने में काफी आसानी हो सकती है। इसका मकसद शहर में साइकिलिंग को बढ़ावा देना भी है। सूत्रों के मुताबिक इस प्रोजेक्‍ट की शुरुआत में सिर्फ 6 स्‍टेशनों से यात्रियों को साइकिल की एंट्री कराने की मंजूरी दी मिलेगी। इनमें छंगमपूजा पार्क, पलारिवट्टम, टाउन हॉल, अर्नाकुलम साउथ, माहराजा कॉलेज और एलमकुलम मेट्रो स्‍टेशन शामिल हैं। इन्‍हीं स्‍टेशनों से साइकिल के साथ यात्रियों की एंट्री और एग्जिट होगा।

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आखिर क्यों क्यों पहना जाता है जनेऊ? क्या होते हैं इसको पहनने के फायदें

आखिर क्यों क्यों पहना जाता है जनेऊ? क्या होते हैं इसको पहनने के फायदें

खबरिस्तान नेटवर्क: यूं तो हिंदू धर्म में बहुत से तरह के संस्कारों का पालन किया जाता है। लेकिन इनमें से एक यज्ञोपवीत संस्कार भी है। यज्ञोपवीत को लोग आमतौर पर जनेऊ के नाम से ही पहचानते और जानते हैं। शायद आपने भी बहुत बार लोगों को जनेऊ पहने देखा होगा। लेकिन क्या आप जानते है ये क्यों पहना जाता है। तो चलिए आज इसी के बारे में जान लेते हैं। आखिर होता क्या है जनेऊ? बता दें जनेऊ तीन धागों से बना एक सूत्र होता है, जिसे बाएं कंधे के ऊपर से दाईं बाजु के नीचे पहना जाता है। वहीँ शास्त्रों में इसे पहनने के कुछ नियम भी बताये गये हैं। अगर इन नियमों का पालन नहीं किया जाता है तो वे लोग इस जनेऊ को पहन नही सकते हैं। हिन्दू धर्म में इसे पवित्र माना जाता है जनेऊ 3 धागों से बना होता है, जिनका कुछ अर्थ होता है। इन तीनों धागो को देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण का प्रतीक मानते हैं। इतना ही नहीं ऐसा भी कहा जाता है कि यह धागे सत्व, रज और तम को दर्शाते हैं। जनेऊ में होते हैं कुल 9 सूत्रयूं तो जनेऊ में कुल 3 सूत्र होते हैं लेकिन एक सूत्र के साथ 3 धागे लगे होते हैं। इस हिसाब से एक जनेऊ में कुल 9 सूत्र होते हैं। यह 9 सूत्र शरीर के नौ द्वार 1 मुख, 2 नासिका, 2 आंख, 2 कान, मल और मूत्र के लिए माने जाते हैं। महिलाएं भी धारण कर सकती हैं जनेऊ? बहुत सी परिस्थिति में पुरुषों की तरह महिलाएं भी जनेऊ को धारण कर सकती हैं। हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि महिलाओं को जनेऊ नहीं पहनना चाहिए। ऐसा वास्तव में है या नहीं इस बारे में तो कोई एक्सपर्ट ही बता सकता है। जनेऊ डालने के कुछ नियम भी हैं जनेऊ पहनने के बहुत से नियम बताये जाते हैं जिनका पालन करना बहुत जरूरी होता है। जैसे जनेऊ को कभी भी गंदे हाथों से नहीं छूना चाहिए। सूतक और लंबे अंतराल के बाद जनेऊ को बदलते रहना चाहिए। बहुत लंबे समय तक एक ही जनेऊ पहनना गलत माना जाता है। इतना ही नही जनेऊ को मल-मूत्र विसर्जन के समय दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए। माना जाता है कि मल-मूत्र के दौरान जनेऊ ऊपर ना करने से अपवित्र हो जाता है। इसको पहनने के कुछ हेल्थ लाभ भी होते हैं बता दें जनेऊ पहनने के हेल्थ बेनेफिट्स भी हैं। जो हृदय रोग और ब्लड प्रेशर की दिक्कत को होने नहीं देता है। साथ ही शरीर में खून का प्रवाह भी सही रहता है। जनेऊ पहनने को ब्लड प्रेशर के लिए भी फायदेमंद बताया गया है। अगर आपको जनेऊ से जुड़ी जानकारी अच्छी लगी हो तो हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

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साढ़े चौबीस लाख रुपए में बिका गणेश जी का करिश्माई लड्डू, जिसने खरीदा उसे वरदान मिला

साढ़े चौबीस लाख रुपए में बिका गणेश जी का करिश्माई लड्डू, जिसने खरीदा उसे वरदान मिला

हैदराबाद, (एजेंसी)। तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में शुक्रवार को 21-किलो वजन वाला बालापुर गणेश लड्डू रिकार्ड कीमत पर 24.60 लाख रुपये में बिका। स्थानीय निवासी वी लक्ष्मा रेड्डी ने इस लड्डू के लिए सफलतापूर्वक बोली लगायी। पिछले साल ये लड्डू 18.90 लाख रूपये में नीलाम हुआ था जिसमें इस वर्ष 5.70 लाख रुपये की वृद्धि हुई है।प्रत्येक वर्ष गणेश विसर्जन यात्रा शुरू होने से पहले इस लड्डू की नीलामी होती है। ये नीलामी अब तक की सबसे बड़ी नीलामी है, जिसकी शुरूआत 28 वर्ष पहले 1994 में हुई थी। बालापुर उत्सव समिति ने इस वर्ष नीलामी में लड्डू की कीमत का अनुमान 20 लाख रुपये लगाया था। इस नीलामी में 10 लोगों ने भाग लिया। शुरुआती सालों में बालापुर लड्डू केवल 450 रुपये में बिका था और अब प्रत्येक वर्ष लड्डू के नीलामी की परंपरा चली आ रही है। लोगों का विश्वास है कि बालापुर लड्डू खरीदने वाले को वरदान मिलता है और नीलामी में इसे जीतने वाला भाग्यशाली होता है। नीलामी में लड्डू जीतने के बाद, विजेता इसका वितरण ग्रामीणों के बीच करेंगे और उपज में बढ़ोत्तरी के लिए इसके कुछ भाग खेतों में भी डालेंगे। इस 21 किलो के लड्डू को 31 अगस्त से शुरू हुए गणेश चतुर्थी के दौरान भगवान गणेश पर चढ़ाया गया था। बालापुर गणेश लड्डू को शुद्ध घी और सूखे मेवे में बनाया जाता है और इसे चांदी के कटोरी में डालकर भगवान गणेश के हाथों में रखा जाता है। प्रत्येक वर्ष हनीवेल फूड्स द्वारा इसे तैयार और दान किया जाता है।

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भारत का ऐसा गांव जिसे यूट्यूबर गांव बोलते हैं, 85 साल की दादी भी YouTuber

भारत का ऐसा गांव जिसे यूट्यूबर गांव बोलते हैं, 85 साल की दादी भी YouTuber

खबरिस्तान नेटवर्क: आज के समय में सोशल मीडिया इतना ज्यादा पूरी दुनिया में फ़ैल गया है कि उसकी पहुंच छोटे छोटे गाँवों तक है। ऐसे ही अगर हम सिर्फ यूट्यूब की बात करें तो उससे तो लोग बहुत लाभ भी उठा रहे हैं। यूट्यूब सिर्फ इंटरटेनमेंट या एजुकेशन हासिल करने का जरिया ही नहीं है। बल्कि अब यूट्यूब इससे काफी आगे बढ़ चुका है और ये लोगों के लिए आय का एक सोर्स बन चुका है। आज के टाइम में लोग यूट्यूब के जरिए मोटी कमाई कर रहे हैं। यही वजह है कि बहुत से लोग अपनी बेहतरीन नौकरियों को छोड़कर यूट्यूबर के तौर पर अपना करियर बनने में लगे हुए हैं। ऐसे में आइए आपको भारत के एक ऐसे गांव के बारे में बताते हैं, जो यूट्यूबर्स का हब बन चुका है। इस गांव में रहने वाले लोग ऑनलाइन वीडियो शेयरिंग प्लेटफॉर्म यूट्यूटब के लिए हर रोज वीडियो बनाते हैं। गांव ऐसा जहाँ हर रोज बनती है विडियो बता दें छत्तीसगढ़ में एक गांव ऐसा है जहाँ सिर्फ विडियो बनती हैं और उस गांव का नाम तुलसी गांव है। इस गांव की 30 फीसदी आबादी यूट्यूबर्स की है। यहां गौर करने वाली बात ये है कि गांव की आबादी ही कुल 3000 है। ऐसे में गांव के 1000 लोगों का यूट्यूबर्स के तौर पर लिया जाता है। इसका मतलब है कि हर तीन में से एक आदमी यूट्यूब पर अपना करियर बना रहा है। यहां लोग यूट्यूब पर सिर्फ करियर ही नहीं बना रहे हैं, बल्कि मोटी कमाई भी कर रहे हैं। यूट्यूब का क्रेज ऐसा है कि लोगों ने सरकारी नौकरियां तक छोड़ दी हैं। सरकारी नौकरी छोड़र बने यूट्यूबर्स आपको बता दें ज्ञानेंद्र शुक्ला और जय वर्मा इस गांव में रहने वाले दो दोस्त हैं, जो बाकी के लोगों की तरह ही यूट्यूब पर वीडियो बनाते हैं। यहां हैरानी की बात ये है कि दोनों ने यूट्यूब पर अपना करियर बनाने के लिए अपनी नौकरियां छोड़ दीं। ज्ञानेंद्र शुक्ला स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में नेटवर्क इंजीनियर के तौर पर काम करते थे। वह एसबीआई में काम करते हुए यूट्यूब वीडियो देखा करते थे। एक दिन उन्होंने तय किया कि अब वह अपना खुद का यूट्यूब चैनल बनाएंगे। अब तक उन्होंने यूट्यूब पर 250 से ज्यादा वीडियो बनाए हैं और उनके 1.15 लाख सब्सक्राइबर्स भी हैं। वहीँ जय वर्मा ने केमेस्ट्री में एमएससी किया हुआ है और वह एक प्राइवेट कोचिंग सेंटर में पार्ट-टाइम टीचर के तौर पर काम करते हैं। यहां से उनकी महीने की 12 से 15 हजार रुपये की कमाई होती थी। लेकिन अब यूट्यूब पर करियर बनाने के बाद उनकी हर महीने की कमाई 30 से 35 हजार रुपये हो चुकी है। इन दोनों लोगों के नक्शेकदम पर चलते हुए अन्य लोगों ने भी वीडियो बनाना शुरू कर दिया है। अब लोग यहां पर शो, शॉर्ट फिल्म और अन्य वीडियो कंटेट बना रहे हैं और उन्हें यूट्यूब पर अपलोड किया जाता है। 85 साल की दादी भी यूट्यूबर है महिला आर्टिस्ट और यूट्यूबर पिंकी साहू ने कहा कि यूट्यूब पर वीडियो बनाने वाले इन ग्रुप्स ने गांव की महिलाओं को सशक्त करने का काम किया है। पिंकी ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा, मुझे यूट्यूब पर वीडियो बनाते 1.5 साल हो गया है। हमारे 40 यूट्यूब चैनल हैं। यहां पर हर कोई वीडियो का हिस्सा बनता है। यहां की महिलाओं को आमतौर पर घरों से बाहर निकलने की इजाजत नहीं होती है। लेकिन अपने यूट्यूब चैनल के जरिए हमने उन्हें काफी जानकारी दी है कि लड़कियां भी कुछ कर सकती हैं। इस गांव में सबसे बूढ़ी एक्टर 85 साल की महिला हैं। जो वैसे तो दादी की उम्र हैं, लेकिन अब यूट्यूब पर करियर बना रही हैं।

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103 साल पुरानी उर्दू रामायण होगी  डिजिटल, इस शहर की यूनिवर्सिटी ने किया कमाल

103 साल पुरानी उर्दू रामायण होगी डिजिटल, इस शहर की यूनिवर्सिटी ने किया कमाल

खबरिस्तान नेटवर्क: उत्तरप्रदेश के मेरठ शहर के चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के राजा महेंद्र प्रताप सिंह लाइब्रेरी में उर्दू में लिखी रामायण अब डिजिटलाइज्ड हो की जा रही है। बता दें 103 साल पुरानी इस रामायण को इस लाइब्रेरी में सहेज कर रखा गया है। उर्दू में लिखी यह रामायण बहुत जल्द अब ऑनलाइन डिजिटल फॉर्मेट में मिल सकेगी। 103 साल पुराणी रामायण मिलेगी ऑनलाइन बतादें राजा महेंद्र प्रताप सिंह लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन प्रोफेसर जे ए सिद्दीकी के मुताबिक महज चार से पांच दिन में 103 साल पुरानी यह रामायण सभी के लिए ऑनलाइन मिलनी शुरू हो जाएगी। उर्दू में लिखी हुई है रामायण उर्दू में लिखी यह 'रामायण' बेहद अनमोल है और केवल इस यूनिवर्सिटी में इसकी एक कॉपी मौजूद है। मेरठ की चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी में छात्र उर्दू में लिखी रामायण का अध्ययन कर रहे हैं।. अमूमन हिंदुओं के पवित्र धार्मिक ग्रन्थ रामायण का अध्ययन हिन्दी, संस्कृति या इंग्लिश में किया जाता है लेकिन चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के राजा महेन्द्र प्रताप लाइब्रेरी में छात्र-छात्राएं इन दिनों उर्दू में लिखी रामायण को पढ़ते देखे जा सकते हैं। उर्दू भाषा में लिखी रामायण के पीछे का इतिहास भी काफी पुराना और रोचक बताया जा रहा है। लाहौर में हुई थी उर्दू रामायण पब्लिश आजादी से पूर्व जब पाकिस्तान और बांग्लादेश भारत का हिस्सा हुआ करते थे, तब 1916 में लाहौर में उर्दू रामायण प्रकाशित की गयी थी। इस रामायण को महात्मा शिवव्रत लाल द्वारा उर्दू में ट्रांसलेट किया गया था। जिससे जो भी उर्दू भाषा में रामायण का अध्ययन करना चाहते हैं, वह इस रामायण को पढ़ सकें। यह रामायण गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखित रामायण के आधार पर ही ट्रांसलेट की गई थी, जिसमें रामायण से जुड़ी सभी चौपाई उर्दू में दी हुई हैं। यूनिवर्सिटी की अनमोल अमानत 103 वर्ष पुरानी यह उर्दू रामायण सिर्फ उन्हीं छात्रों को दी जाती है, जो इसके बारे में जानना चाहते हैं। इतना ही नहीं रामायण को पढ़ने के लिए लाइब्रेरी प्रशासन का कोई ना कोई पदाधिकारी साथ में रहता है, क्योंकि यह यूनिवर्सिटी की एक अनमोल अमानत है। दरअसल जिस पब्लिकेशन हाउस में यह उर्दू रामायण पब्लिश हुई थी, उसका यह अशं सिर्फ चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के पास है। हालांकि अन्य विश्वविद्यालयों में उर्दू में रामायण तो है, लेकिन इस पब्लिकेशन का अंश नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड की प्रक्रिया शुरू लाइब्रेरी प्रशासन जल्द ही इस खास रामायण को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लॉन्च करने की तैयारी कर चूका है। प्रशासन द्वारा इस उर्दू रामायण को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है, जिससे कि जो भी उर्दू भाषाई छात्र-छात्राएं हैं वो उर्दू में इस रामायण को पढ़ पाएंगे। इस अनमोल रामायण को सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सीसीएसयू लाइब्रेरी की वेबसाइट पर जाकर भविष्य में अध्ययन किया जा सकता है।

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रहस्य : हिमाचल की इस झील में गढ़ा है अरबों रुपए का खजाना

रहस्य : हिमाचल की इस झील में गढ़ा है अरबों रुपए का खजाना

हिमाचल अपने पौराणिक महत्व के साथ-साथ रहस्यों का गढ़ भी माना जाता है। बर्फ की चादर ओढ़े यहां कई ऐसे स्थल मौजूद हैं जिनका इतिहास काफी पुराना बताया जाता है। कुछ स्थलों की पहचान महाभारत काल से की गई है जबकि कुछ स्थल आज भी हमारे सामने मात्र रहस्य के रूप में मौजूद हैं। लेकिन आज हम किसी भूखंड की नहीं बल्कि हिमाचल में मौजूद एक ऐसी झील बात करेंगे जहां अरबों-खरबों का खजाना गढ़े होने की बात कही जाती है। जिसके बारे में आज तक कोई पता नहीं लगा सका। जानिए इस झील से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को। अगर आप रोमांच के साथ रहस्य का भी शौक रखते हैं तो यहां का प्लान बना सकते हैं। कमरुनाग झील मंडी के पहाड़ों के बीच स्थित है। इस झील का नाम घाटी के देवता कमरुनाग के नाम पर पड़ा है। धार्मिक मान्यता है कि प्रतिवर्ष 14-15 जून को बाबा कमरुनाग पूरी दुनिया में दर्शन देते हैं। इस दौरान हिमाचल में भक्तों का उत्साह देखने लायक होता है। झील में करोड़ों-अरबों का खजाना है लेकिन कोई भी इसे निकाल नहीं सकता। कहते हैं कि इच्छाधारी नाग इस खजाने की रक्षा करते हैं। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस क्षेत्र में ज्यादातर सांप की तरह दिखने वाले छोटे-छोटे पौधे मिलते हैं। मंदिर के समीप एक झील है जहां पर मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु सोने, चांदी के जेवर और सिक्के चढ़ाते हैं। यह परंपरा पांडवों के समय से चली आ रही है। कहा जाता है कि जब पांडव देव कमरूनाग से मिलने आए तो उन्होंने भी सोने-चांदी के गहने इस झील में अर्पित किए थे। इस अद्भुत झील का निर्माण भी पांडवों ने किया है। जब पांडव देव कमरूनाग से मिलने आए थे तो देव कमरूनाग ने कहा कि प्यास लगी है। तब भीम ने धरती पर वार किया और अपने हाथ से पानी की झील प्रकट की। साथ ही जाते समय सारा सोना-चांदी इसी झील में डाल दिया। महाभारत काल से संबंध कमरूनाग देवता का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। इसलिए बाबा कमरूनाग जी को बबरूभान जी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार कमरूनाग धरती के सबसे बलशाली योद्धा थे। लेकिन भगवान कृष्ण के आगे इन्हे झुकना पड़ा। ऐसा कहा जाता है कि महाभारत युद्ध से पहले कमरूनाग जी ने कहा था कि जो इस युद्ध में हारने की स्थिति में होगा मैं उसका साथ दूंगा। इसी बीच कृष्ण ने एक नीति के तहत कमरूनाग जी का सर ही मांग लिया। कहा जाता है अगर कमरूनाग कौरवों का साथ दे देते, तो पांडव युद्ध में कभी विजयी नहीं हो पाते। कहा जाता है कि कमरूनाग जी के कटे सर में भी अपार ताकत थी। भगवान कृष्ण ने इनका सर हिमालय की एक ऊंची चोटी पर रखवा दिया था। लेकिन सर जिस तरफ घूमता वह सेना जीत की ओर बढ़ती। पौराणिक मान्यता के अनुसार कृष्ण ने कटा सर पत्थर से बांध कर पांडवों की ओर मोड़ दिया था। कमरुनाग के लिए कैसे पहुंचें कमरूनाग के लिए सीधी सड़क नहीं है, आप मंडी से रोहांडा तक सड़क मार्ग के द्वारा जा सकते हैं। रोहांडा मंडी से लगभग 60 किमी की दूरी पर स्थित है। जिसके बाद आपको लगभग 8 किमी की चढ़ाई चढ़नी होगी। यहां का नजदीकी हवाई अड्डा कुल्लू एयरपोर्ट है। रेल मार्ग के लिए आप जोगिंदर नगर रेलवे स्टेशन का सहारा ले सकते हैं।

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अब मशीन से निकलेगा पेपर डोसा, जो खाने में होगा करारा, जानें कैसे

अब मशीन से निकलेगा पेपर डोसा, जो खाने में होगा करारा, जानें कैसे

खबरिस्तान नेटवर्क: यूं तो इंसानो ने इतनी ज्यादा तरक्की कर ली है कि हर तरह की मशीन हमें देखने को मिल जाती है। कहने का मतलब जो चीज़ें हमारे लिए करना काफी मुश्किल हुआ करती थीं, वो आज आसान हो चुकी हैं। वहीँ पहले हमें जिन कामों में अपना सारा वक्त और ताकत लगा दिया करते थे। अब वो मशीन द्वारा बहुत ही आसानी से हो जाता है। तो आपको बता दें ऐसे में इंसान ने एक और मशीन को मार्किट में उतारा है जो आपको डोसा बनाने में हेल्प करेगी। डोसा प्रिंट करने वाली मशीन सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफार्म है जहाँ मिनटों में चीजें वायरल हो जाती है। अब एक ऐसी ही विडियो वायरल हो रही है, जिसे डोसा प्रिंटर बोला जा रहा है। ये मशीन कमाल की है। इसमें करारे और पतले डोसा प्रिंट होकर निकलते हैं। ट्विटर पर समांथा नाम की यूज़र ने इस मशीन के विज्ञापन का वीडियो शेयर किया है। इस विडियो में साफ़ दिख रहा है कि डोसा बैटर को मशीन के एक साइड में बने कंटेनर में डाला जाता है। इसके बाद मशीन से डोसा की मोटाई, करारापन और उसकी गिनती सेलेक्ट करनी होती है। टाइमर के मुताबिक डोसा बनकर किसी पेपर प्रिंट की तरह बाहर आता है। मशीन ने किया सबको हैरान दरअसल evochef नाम की एक कंपनी ने डोसा प्रिंटर मशीन मार्किट में उतारी है। ये मशीन मिनटों में पेपर डोसा बनाकर देगी। वहीँ बता दें जब से ये वीडियो शेयर किया गया है तब से इस वीडियो को 1.1 m व्यूज मिल चुकें हैं। लोग काफी हैरान हो रहे हैं। इस मशीन के बारे में लोग अलग अलग राय भी दे रहे हैं। किसी ने कहा कि ये खराब ही होगा। एक यूज़र ने लिखा -इस मशीन की वजह से दादी जल्दी रिटायर हो जाएंगी। वहीं कुछ लोगों को ये पसंद आई है और उन्होंने कहा कि डोसा फैन के तौर पर वो ज़रूर इसे ट्राई करना चाहेंगे। ये डोसा प्रिंटिंग मशीन अकेली ही साउथ इंडियन खाने की लिस्ट में अजीब चीज नहीं है। श्री बालाजी डोसा की ओर से दक्षिणी मुंबई के मंगलदास मार्केट में लोगों को फ्लाइंग डोसा परोसा जाता है, जो सीधा तवे से थाली में लैंड करता है।

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