करवा चौथ पर चंद्रमा की पूजा का क्या है महत्व



राजा दक्ष ने किसे दिया था श्राप, भगवान शिव के माथे पर किसे मिला था स्थान

वेब डेस्क@wk

हिंदू धर्म में व्रत का खास महत्व बताया गया है। पुरुष और महिलाएं दोनों व्रत करते हैं। पर कुछ व्रत खास हैं, जिनमें करवा चौथ और छठ अहम हैं। करवा चौथ में चांद और छठ में सूर्य का महत्व है। महिलाओं के लिए ऐसे और भी कई व्रत हैं, जिनमें दिन भर उपवास के बाद शाम चंद्रमां को अर्ध्य देकर अन्न जल ग्रहण किया जाता है।


ऐसा माना गया है कि सौभाग्य, संतान, धन-धान्य, पति की रक्षा एवं संकट टालने के लिए चंद्रमा की पूजा की जाती है। इसके अलावा उपवास से शरीर को भी लाभ मिलता है। दशहरा बीत गया है और करवाचौथ का व्रत आने वाला है। करवा चौथ का व्रत महिलाएं अखंड सुहाग और पति की लंबी उम्र के लिए रखती हैं।

राजा दक्ष ने दिया था चंद्रमा को श्राप

उपनिषद् में कहा गया है कि चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्म को जानकर उपासना से बुरे कर्म नष्ट होते हैं। लंबी आयु मिलती है। अग्निदेव कहते हैं कि ऐसा करने वालों की मैं रक्षा करता हूं। चंद्रमा को मन का देवता कहा गया है। मन की चंचलता को चंद्रमा प्रभावित करता है। पुराणों में लिखा है कि चंद्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की कन्याओं से हुआ थे। चंद्रमा द्वारा पूरा ध्यान न देने पर बेटियां दक्ष के पास शिकायत लेकर पहुंचीं।

दक्ष ने गुस्से में चंद्रमा को क्षय रोग का श्राप दे दिया। चंद्रमा ने शिव की भक्ति की। शिव प्रसन्न हुए तो उन्होंने चंद्रमा को मस्तक पर ले लिया। दक्ष ने शिव से कहा कि वह चंद्रमा को उसे सौंप दे वरना श्राप सहने के लिए तैयार रहे। भगवान शिव भगवान विष्णु के पास पहुंचे। उन्होंने चंद्रमा के दो रूप कर दिए एक राजा दक्ष को दे दिया और दूसरा भगवान शिव को। इस तरह दक्ष का श्राप भी बना रहा और चंद्रमा श्राप मुक्त भी हो गए। श्राप का ही असर है कि चंद्रमा 15 दिन घटता है और 15 दिन बढ़ता है। इसलिए चंद्रमा की करवा चौथ पर पूजा होती है।

पराशक्ति का प्रतीक है चांद

चंद्रमा को पराशक्ति का प्रतीक माना गया है। हमारे शरीर में दोनों भ्रुवों (भौंहों) के बीच मस्तक पर चंद्रमा का स्थान माना गया है। यहां पर रोली, चंदन आदि का तिलक और बिंदी लगाई जाती है, जो चंद्रमा को प्रसन्न कर मन का नियंत्रण करती है। हठयोग में चंद्रमा का सहयोग जरूरी माना गया है। तंत्रशास्त्र में भी चंद्रमा को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है। महादेव शिव के मस्तिष्क पर अर्धचंद्र की उपस्थिति उनके योगी स्वरूप को प्रकट करती है। अर्धचंद्रको आशा का प्रतीक मानकर पूजा जाता है।

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