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आज है अखबार दिवस, जानिए इस दिन का इतिहास और महत्व

आज है अखबार दिवस, जानिए इस दिन का इतिहास और महत्व

खबरिस्तान नेटवर्क। भारत में समाचार पत्रों की शुरुआत का सम्मान करने के लिए निर्धारित एक दिन को भारतीय समाचार पत्र दिवस के रूप में जाना जाता है। इस दिन का उद्देश्य भारतीय समाचार पत्रों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। भारतीय समाचार पत्र दिवस, जो प्रत्येक वर्ष 29 जनवरी को मनाया जाता है, आज है। 29 जनवरी, 1780 को पहला भारतीय अखबार प्रकाशित हुआ था। पहले साप्ताहिक प्रकाशन को "हिक्की का बंगाल राजपत्र" कहा जाता था, जिसे "कलकत्ता जनरल विज्ञापनदाता" भी कहा जाता है। संचार का एकमात्र रूप जो निषेधात्मक रूप से महंगा नहीं था और जिसमें उपयोगी जानकारी थी, प्रिंट था। एशिया में छपने वाला पहला समाचार पत्र हिक्की का बंगाल गजट था। यह उस समय देश की राजधानी कोलकाता में 29 जनवरी, 1780 को प्रकाशित हुआ था। समाचार पत्रों ने उस समय के दौरान काम करने के तरीके को बदल दिया जब समाचारों को लक्षित दर्शकों तक पहुंचने में कई दिन लग जाते थे। लेकिन चूंकि ब्रिटिश सरकार को अखबारों से होने वाले नुकसान के बारे में पता था, इसलिए उन्होंने 1782 में उन्हें प्रकाशित करना बंद करने का फैसला किया। हिक्की का बंगाल गजट एशिया में छपने वाला पहला समाचार पत्र हिक्की का बंगाल गजट था। यह उस समय देश की राजधानी कोलकाता में 29 जनवरी, 1780 को प्रकाशित हुआ था। समाचार पत्रों ने उस समय के दौरान काम करने के तरीके को बदल दिया जब समाचारों को लक्षित दर्शकों तक पहुंचने में कई दिन लग जाते थे। लेकिन चूंकि ब्रिटिश सरकार को अखबारों से होने वाले नुकसान के बारे में पता था, इसलिए उन्होंने 1782 में उन्हें प्रकाशित करना बंद करने का फैसला किया। प्रथम भारतीय समाचार पत्र के बारे में तथ्य हिक्की के बंगाल गजट में लिखा गया लेखन बेहद व्यंग्यात्मक और विचारोत्तेजक था। अख़बार ने वर्जित विषयों और प्रोटो-क्लास चेतना पर बहस करते हुए प्रतिनिधित्व के साथ गरीबों के अधिकारों और कराधान के अधिकार की वकालत की। इसने जनता को अनुसंधान द्वारा समर्थित चित्र और सम्मोहक लेख प्रदान किए ताकि वे मूल्यांकन कर सकें कि उनके लिए क्या उपयोगी था और क्या नहीं। भारतीय समाचार पत्र दिवस 2023: महत्व समाचार पत्र हर दिन नई कहानियों से भर रहे हैं जो बच्चों को नए शब्दों से परिचित करा सकते हैं, जिससे वे अपनी शब्दावली का विस्तार कर सकते हैं और अपने संचार कौशल में सुधार कर सकते हैं। समाचार पत्र आपको नए शब्द सीखने में मदद करते हैं। समाचार पत्रों से पढ़ने के कौशल में सुधार होता है। बच्चों के पढ़ने और समझने के कौशल को रोजाना अखबारों के सामने रखकर उनमें सुधार किया जा सकता है। समाचार पत्र विश्लेषणात्मक सोच को प्रोत्साहित करते हैं। समाचार पत्रों में विचार और वर्तमान घटनाएं जीवन में आती हैं। दुनिया में वर्तमान घटनाओं के बारे में चर्चा उनके बारे में अखबारों के लेख पढ़कर शुरू की जा सकती है। समाचार पत्र दुनिया के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के वैयक्तिकृत समाचार फ़ीड युवा लोगों के लिए अपने स्वयं के समुदायों और रुचियों के बाहर की दुनिया को पहचानने और समझने को चुनौतीपूर्ण बना सकते हैं। समाचार पत्र नागरिक जुड़ाव को प्रोत्साहित करते हैं। समाचार पत्रों के बिना, युवा लोग उन सामाजिक समस्याओं के बारे में कभी नहीं जान पाएंगे जो उनके अपने पड़ोस में मौजूद हैं या जो पूरे देश और दुनिया के लोगों को प्रभावित करती हैं। समाचार पत्र पढ़ना मनोरंजक है। समाचार पत्र कंप्यूटर, टैबलेट और स्मार्टफोन से स्वागत योग्य ब्रेक प्रदान करते हैं, और बच्चों को पन्ने पलटने और अपने हाथों पर कुछ स्याही प्राप्त करने का आनंद मिल सकता है।

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अंडा समझकर गोल्फ की गेंद को निगलने लगा बाज

अंडा समझकर गोल्फ की गेंद को निगलने लगा बाज

खबरिस्तान नेटवर्क। आपने कई वीडियो में बाज को अंडे खाते देखा होगा। लेकिन कभी बाज को गोल्फ की गेंद खाते देख है। जी हां यह घटना हुई है दक्षिण अफ्रीका के क्रूगर नेशनल पार्क में। यहां की सफारी लाज के मैनेजर रिहान वैन ने यह तस्वीर खींची है। रिहान की नजर एक बाज पर पड़ी, जो अंडा निगलने की कोशिश कर रहा था। अंडा बड़ा था, इसलिए वह निगल नहीं पाया। फिर उसने अंडा फोड़ने की कोशिश की, लेकिन विफल रहा। अंत में थक हारकर बाज अंडा छोड़कर उड़ गया। बाद में पता चला कि बाज जिसे अंडा समझ कर निगलने की कोशिस कर रहा था वह असल में गोल्फ की गेंद थी। रिहान ने इस पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि कहीं भी कुछ फेंक देने की आदत से बचना होगा। अगर किसी तरह बाज ने गेंद को निगल लिया होता तो उसका बच पाना मुश्किल था।

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बसंत पंचमी से ब्रज के मन्दिरों में किशोरीजी एवं श्यामसुन्दर की होली शुरु

बसंत पंचमी से ब्रज के मन्दिरों में किशोरीजी एवं श्यामसुन्दर की होली शुरु

मथुरा (वार्ता) जहां उत्तरी भारत में बारिश और कड़ाके की ठंढ से जन जीवन अस्तव्यस्त हो गया है वहीं बसंत पंचमी से ब्रज के मन्दिरों में किशोरी जी एवं श्यामसुन्दर की होली शुरू हो जाती है। मथुरा के अधिकांश मन्दिरों में बसंत पंचमी का त्योहार 26 जनवरी को मनाया जाएगा। वृन्दावन की बिहारी जी मन्दिर एवं सप्त देवालयों की होली मशहूर है। बांकेबिहारी मन्दिर के शयनभोग सेवा अधिकारी शंशांक गोस्वामी ने आज बताया कि मन्दिर में गुरूवार को आयोजित वसंत पंचमी से होली की शुरूआत हो जाती है। ठाकुर के कपोलों पर गुलाल लगना शुरू हो जाता है तथा बसंत पर पीली पोशाक में ठाकुर लकुटी की जगह लट्ठ लेते हैं और फेंटा बांधते है। दिन में आयोजित तीनों आरतियों में प्रसाद स्वरूप भक्तों पर गुलाल का उड़ना शुरू हो जाता है तथा अधिकांश भोग भी पीला होता है। भोग में पीले ऋतु फल का प्रयोग वृन्दावन के मन्दिरों में राधा बल्लभ मन्दिर में भी बसंत से होली शुरू हो जाती है तथा भक्तों को आरती के बाद गुलाल प्रसाद स्वरूप मिलता है। इस दिन भोग भी बसंती, श्रंगार भी बसंती और समाज गायन भी राग बसंत में होता है तो राधारमण मन्दिर के सेवायत आचार्य दिनेशचन्द्र गोसवामी के अनुसार भोग में अधिकांशतः केशर का प्रयोग होता है तथा भोग में पीले ऋतु फल का प्रयोग होता है। ठाकुर को इस दिन सरसों के फूल की माला धारण कराई जाती है। पोशाक भी वसंती होती है। संध्या समय ठाकुर जी जगमोहन में विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देते हैं। राजभोग में ठाकुर के कपोलो पर गुलाल लगाते हैं और फिर भक्तों पर यह प्रसादस्वरूप डाला जाता है। पोशाक धारण कराकर बसंती भोग वृन्दावन के सप्त देवालयों में मशहूर राधा दामोदर मन्दिर में बसंत पंचमी से गौर पूर्णिमा तक संध्या आरती बसंत राग में गाई जाएगी। मन्दिर के सेवायत आचार्य बलराम गोस्वामी के अनुसार इस दिन ठाकुर को बसंती पोशाक धारण कराकर बसंती भोग लगाया जाता है। ठाकुर के कपोलों में गुलाल लगाकर उसे उनके श्रीचरणों में अर्पित करते हैं और बाद में यही भक्तों पर डाला जाता है। मन्दिर को पीले कपड़े से ढ्का जाता लाडली मन्दिर बरसाना में बसंत से समाज गायन शुरू हो जाता है जो होली तक चलता है। मन्दिर के सेवायत रास बिहारी गोस्वामी के अनुसार इस दिन बसंती बंगला बनता है। पूरे मन्दिर को पीले कपड़े से ढ्का जाता। श्यामाश्याम इस दिन से पहले गुलाल की होली खेलते हैं बाद में प्रसादस्वरूप इसे भक्तों के मत्थे पर लगाया जाता है। इस मन्दिर में शिवरात्रि से भक्तों पर गुलाल डालना शुरू हो जाता है। प्रसादस्वरूप भक्तो पर गुलाल डाला उधर दाऊजी मन्दिर बल्देव में आज ही वसंत मनाया जा रहा है तथा आज पहले रेवती मां और दाऊजी ने गुलाल से होली खेली और बाद में किशोरी जी और श्यामसुन्दर ने खेली तथा अंत में प्रसादस्वरूप भक्तो पर यही गुलाल डाला गया । मन्दिर के रिसीवर राम कठोर पाण्डे ने बताया कि आज से 45 दिवसीय होली महोत्सव शुरू हो गया है। 42वें दिन मशहूर हुरंगा होगा तथा इसके तीन दिन बाद तक रंग पंचमी मनाई जाएगी। इसी श्रंखला में भारत विख्यात द्वारकाधीश मन्दिर में भी बसंत पंचमी से होली की शुरूवात हो जाती है। 50 दिन तक चलता है धूम धड़ाका श्यामाश्याम द्वारा होली खेलने के बाद राजभोग में इसे भक्तों पर डाला जाता है। प्राचीन केशवदेव मन्दिर मल्लपुरा में बसंतोत्सव मन्दिर के पाटोत्सव के रूप में मनाया जाता है । मन्दिर के सेवायत बिहारीलाल गोस्वामी के अनुसार इस दिन ठाकुर का 56 भोग लगता है तथा पीला हेाता है। भागवत सप्ताह के समापन के बाद आज हवन का अयोजन किया गया तथा वसंत को संतो का भंडारा एवं प्रसाद वितरण होगा । ठाकुर के श्रीचरणों में गुलाल इसी दिन से रखा जाता है जो भक्तों के मस्तक पर प्रसादस्वरूप लगाया जाता है। अधिकांश मन्दिरों में इसी दिन प्रतीक के रूप में होली का ढांड़ा गाड़ा जाता है। कुल मिलाकर इसी दिन से ब्रज में होली का धूम धड़ाका शुरू हो जाता है जो 50 दिन तक चलता है। व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाईन करने के लिए लिंक पर क्लिक करें https://chat.whatsapp.com/LVthntNnesqI4isHuJwth3

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बसंत पंचमी के लिए जरूरी है ये सामग्रियां, सरस्वती पूजा से पहले ही कर लें तैयारी

बसंत पंचमी के लिए जरूरी है ये सामग्रियां, सरस्वती पूजा से पहले ही कर लें तैयारी

खबरिस्तान नेटवर्क। बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा भी कहा जाता है। हर साल माघ शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी होती है। इस दिन विद्यालयों और मंदिरों से लेकर घरों में लोग मां सरस्वती की पूजा करते हैं। इस साल सरस्वती पूजा गुरुवार 26 जनवरी 2023 को है। यदि आप बसंत पंचमी के दिन घर पर ही मां सरस्वती पूजा करने वाले हैं तो पहले से ही इसकी तैयारी कर लें और पूजा में प्रयोग होने वाली जरूरी सामग्रियों की सूची तैयार कर बाजार से इसकी खरीदारी भी कर लें। ऐसे में पूजा वाले दिन किसी सामग्री के न होने के कारण पूजा में विघ्न नहीं होगी और पूजा अच्छे से संपन्न होगी। सरस्वती पूजा के लिए ये सामग्रियां है जरूरी पीले रंग के फूल और माला, लकड़ी की चौकी, पीले रंग का कपड़ा बिछाने के लिए, सफेद तिल के लड्डू, सफेद धान के अक्षत, पके हुए केले की फली का पिष्टक, आम के पत्ते, बैठने के लिए आसन, धूप या अगरबत्ती, घी, दीपक और बाती, मौसमी फल, गुड़, हल्दी, कुमकुम, जल के लिए कलश या पात्र, माचिस, देवी सरस्वती की मूर्ति या तस्वीर, नारियल, भोग के लिए मिष्ठान, केसर का हलवा या फिर केसरिया भोग, सुपारी, पूजा के लिए थाली, घर पर कैसे करें देवी सरस्वती की पूजा। गंगाजल छिड़क कर करें शुद्धि बसंत पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत होकर साफ कपड़े पहनें। संभव हो तो इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनें। अब पूजा मंदिर या पूजास्थल की साफ-सफाई करें और गंगाजल छिड़कर इस जगह की शुद्धि कर लें। पूजा की चौकी पर पील रंग का कपड़ा बिछाएं और देवी सरस्वती की प्रतिमा या फोटो स्थापित करें। देवी सरस्वती के बगल में भगवान गणेश की मूर्ति भी जरूर रखें। चौकी के पास अपनी किताबें या कला से जुड़ी चीजें भी रखें। एक कलश में जलभरकर रखें और इसमें आम के पांच पत्ते की डली डालें और ऊपर नारियल रख दें। देवी सरस्वती को हल्दी, कुमकुम का तिलक लगाएं। पीले फूलों की माला पहनाएं और वस्त्र अर्पित करें। साथ ही साथ भगवान गणेश की भी पूजा करें। पूजा में अक्षत, फल, सुपारी और भोग आदि अर्पित करें और फिर धूप-दीप जलाएं। हाथ जोड़कर सरस्वती मंत्र का जाप करें। अब आखिर में आरती करें और आशीर्वाद लें। इस दिन सरस्वती वंदना करना भी शुभ होता है। पूजा समाप्त होने के बाद भोग का वितरण करें।

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इस देश ने सेक्स पर लगाया प्रतिबंध, कानून तोड़ने पर काटनी पड़ सकती है इतने साल की जेल

इस देश ने सेक्स पर लगाया प्रतिबंध, कानून तोड़ने पर काटनी पड़ सकती है इतने साल की जेल

खबरिस्तान नेटवर्क। दुनिया के मशहूर पर्यटक स्थलों में से एक इंडोनेशिया ने अपने देश में बिना शादी के सेक्स करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। सेक्स बैन कानून स्थानीय लोगों के साथ-साथ सैलानियों पर भी लागू होगा। कानून तोड़ने वालों के लिए एक साल की जेल की सजा का प्रावधान है और उन्हें इस दौरान जुर्माना भी भरना पड़ सकता है। इंडोनेशिया की संसद में इस कानून को पारित किया था जो अब लागू हो गया है। इस नए कानून के लागू होने से देश की टूरिस्ट इंडस्ट्री को झटका लगने की संभावनाएं बढ़ गई है। कानून क्या कहता है इंडोनेशिया की संसद ने जिस नए क्रिमिनल कोड को मंजूरी दी है, उसके तहत अब देश में शादीशुदा पार्टनर के अलावा किसी और के साथ सेक्स पर पूरी तरह से पाबंदी होगी। अगर कोई भी व्यक्ति कानून का उल्लंघन करता है तो उसे एक साल तक की कैद की सजा हो सकती है या उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है। सजा के तौर पर इंसान को जेल और जुर्माना दोनों भी हो सकते हैं। यह कानून स्थानीय नागरिकों के साथ-साथ देश में आने वाले पर्यटकों पर भी लागू होगा। यहां तक कि अगर पर्यटक घूमने आते हैं तो भी यह जांच की जाएगी कि यह जोड़ा शादीशुदा है या नहीं। यहां शादीशुदा लोगों को सेक्स करने की इजाजत होगी। इस देश में अविवाहित जोड़े एक साथ नहीं रह सकेंगे और न ही दूसरे देशों से आए अविवाहित जोड़े यहां आकर साथ रह सकते हैं। सैलानियों को सताया यह डर कोरोना के बाद से देशों की हालत पहले से ही पतली हो चुकी है। देशों को टूरिस्ट इंडस्ट्री बैठ चुकी है और ऐसे में दुनिया के सबसे आकर्षक पर्यटक स्थल में से एक पर सेक्स बैन लगना इसके लिए और भी खतरनाक साबित हो सकता है। बाली में मिली राहत पर्यटकों की लगातार गिरती संख्या के बीच बाली की गवर्नर ने कुछ रियायत दी है। बाली गवर्नर ने घोषणा की है कि नए कानून के तहत पर्यटकों पर कार्रवाई नहीं की जाएगी न ही उनके कमरों को चेक किया जाएगा। बाली देश ही नहीं बल्कि दुनिया के पॉपुलर टूरिस्ट स्पॉट्स में से एक है। इंडोनेशिया को उम्मीद थी कि 2025 तक पर्यटन महामारी से पहले के स्तर पर पहुंच जाएगा। लेकिन नए कानून के लागू होने से देश को बड़ा झटका लगा है। राष्ट्रीय पर्यटन बोर्ड भी इस कानून को खराब बता रहा है। एसोसिएशन ऑफ द इंडोनेशियन टूर एंड ट्रैवल एजेंसी बाली के अध्यक्ष आई पुतु विनास्ट्रा ने कहा कि कानून यूरोपीय देशों के पर्यटकों को यहां आने से रोकने में एक अहम भूमिका निभाएगा। क्‍योंकि यूरोपीय देशों में बिना शादी के भी कपल्‍स रहते हैं और बच्‍चों को जन्‍म देते हैं। यह कानून उनकी राइट तो प्राइवेसी का हनन करेगा।

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बसंत पंचमी पर भूलकर भी ना करें ये काम, मां सरस्वती हो जाएंगी नाराज

बसंत पंचमी पर भूलकर भी ना करें ये काम, मां सरस्वती हो जाएंगी नाराज

खबरिस्तान नेटवर्क। विद्या, कला और संगीत की देवी सरस्वती की विशेष पूजा-आराधना बसंत पंचमी पर की जाती है। बसंत पंचमी हर साल माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। इस साल बसंत पंचमी का पर्व 26 जनवरी 2023 दिन गुरुवार को मनाया जा रहा है। इस दिन को अबूझ मुहूर्त के रूप में भी जाना जाता है। यह वह शुभ मुहूर्त होता है, जिस दिन आप बिना चौघड़िया के हर मांगलिक कार्य कर सकते हैं परंतु कुछ काम ऐसे भी हैं, जिन्हें बसंत पंचमी के दिन नहीं करना चाहिए। वे कौन से काम हैं? आइए जानते हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से। पेड़-पौधे न काटें धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बसंत पंचमी के दिन भूलकर भी किसी पेड़-पौधे को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। फिर चाहे बात उनकी कटाई-छटाई की हो या फूल तोड़ने की, गलती से भी ऐसा नहीं करना चाहिए। सात्विक भोजन ग्रहण करें धार्मिक शास्त्रों के अनुसार बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती का अवतरण हुआ था, इस दिन मांसाहार और शराब का सेवन करने से बचना चाहिए। इससे माता सरस्वती नाराज हो सकती हैं। मनुष्य को इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। तामसिक भोजन से मनुष्य गुस्सा होता है और उसके मन में दूसरे के प्रति बुरे विचार आते हैं। बसंत पंचमी के दिन दूसरों के लिए बुरे विचार लाने से भी बचना चाहिए। ना करें धूम्रपान धार्मिक ग्रंथों के अनुसार बसंत पंचमी का दिन बेहद शुभ और पवित्र दिन माना गया है। इस दिन धूम्रपान भी नहीं करना चाहिए। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार बसंत पंचमी के दिन अपनों से बड़ों के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेना चाहिए। उनका आदर सम्मान करना चाहिए। इस दिन किसी की भी अवहेलना नहीं करना चाहिए। इस रंग के कपड़े ना पहनें धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बसंत पंचमी के दिन काले रंग के वस्त्र धारण करने से हर स्त्री-पुरुष को बचना चाहिए। इस दिन पीले रंग के वस्त्र पहनना बेहद शुभ माना जाता है। ना करें कंघी धार्मिक ग्रंथों के अनुसार बसंत पंचमी के दिन सुबह के समय स्नानादि से निवृत्त होकर बालों में कंघी कर लें। परंतु सूर्यास्त के बाद इस दिन कंगी करने से बचना चाहिए। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में कंघी को लेकर कई नियम बताए गए हैं।

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आज है अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस... जानें इस दिन का इतिहास और महत्व

आज है अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस... जानें इस दिन का इतिहास और महत्व

खबरिस्तान नेटवर्क। शिक्षा हर व्यक्ति के लिए जरूरी और उसका मूलभूत अधिकार है। लेकिन त्रासदी यह है कि आज भी दुनिया भर में असंख्य बच्चे विभिन्न कारणों से शिक्षा प्राप्त कर पाने में असमर्थ हैं, और इसकी मुख्य वजह है गरीब बच्चों की शिक्षा का समुचित व्यवस्था का अभाव। शिक्षा हासिल करने के लिए बच्चों एवं उनके अभिभावकों को तमाम संघर्ष करना पड़ता है, इसी वजह से उनका सही विकास नहीं हो पाता। शिक्षा एक मानवीय अधिकार है और सार्वजनिक जिम्मेदारी भी। शिक्षा के इस महत्व को देखते हुए प्रत्येक वर्ष 24 जनवरी के दिन अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस धूमधाम के साथ मनाया जाता है। आज हम अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर शिक्षा के महत्व, इसके इतिहास एवं उद्देश्य आदि पर विस्तार से बात करेंगे। इस दिन का इतिहास दुनिया भर में तमाम देश हैं, जहां बच्चों को समुचित शिक्षा प्राप्त नहीं होने से उनका भौतिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्तर काफी हद तक प्रभावित हुआ है। बच्चों के मौलिक शैक्षिक अधिकार की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 3 दिसंबर 2018 को एक अहम फैसला लेते हुए 24 जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया, इस अवसर पर नाइजीरिया समेत 58 से ज्यादा देश के अधिकारियों ने इस अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस में शामिल होकर अपनी सहमति दर्ज कराई। इसके बाद से प्रत्येक वर्ष 24 जनवरी को दुनिया भर के बच्चों को मुफ्त एवं बुनियादी शिक्षा देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस सेलिब्रेट किया जा रहा है। क्यों मनाया जाता है विश्व शिक्षा दिवस? किसी भी देश के विकास का स्तर उस देश के शैक्षिक एवं बौद्धिक स्तर से मापा जा सकता है। विश्व शिक्षा दिवस की महत्ता को देखते हुए इस दिन को विभिन्न देशों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। इस अवसर पर तरह-तरह के वैश्विक ग्लोबल इवेंट्स आयोजित किये जाते हैं। इन आयोजनों को अमूमन तीन विषयों लर्निंग, इनोवेशन और फाइनेंसिंग में बांटा जाता है। इसे वैश्विक आयोजन के रूप में न्यूयार्क एवं पेरिस स्थित युनेस्को मुख्यालय में आयोजित किया जाता है। इस विविधरंगी आयोजन में शामिल अधिकारियों की कोशिश होती है कि दुनिया भर में शांति एवं विकास हेतु शिक्षा की भूमिका को बढ़ावा दिया जाये, और शिक्षा में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जाये। शिक्षा के क्षेत्र में कहां है भारत शिक्षा समृद्धि का एकमात्र माध्यम है। सौभाग्य से ब्रिटिश हुकूमत से आजाद होने के बाद आजाद भारत के कर्णधारों ने इसे समझा और इस पर काफी काम किया। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 1947 में आजाद भारत की कुल जनसंख्या करीब 36 करोड़ थी, जबकि साक्षरता दर सिर्फ 18 प्रतिशत थी, इसमें महिलाओं की स्थिति बेहद चिंताजनक थी। 8।9 प्रतिशत से भी कम महिलाएं शिक्षित थीं। जागरूकता और शैक्षिक योजनाओं के कारण साल 2021 में जहां कॉमन साक्षरता दर 77।7 प्रतिशत तक बढ़ी, जिसमें पुरुष (84।7) और महिला में (70।3) प्रतिशत की उछाल देखने को मिली। इसकी वजह यह थी कि साल 1948 में जहां स्कूलों की कुल संख्या 1 लाख 52 हजार 814 थी, साल 2021 तक आते-आते यह संख्या 15 लाख 7 हजार 708 तक पहुंची। आजादी के समय देश में केवल 36 इंजीनियरिंग कॉलेज थे, जिसमें सालाना ढाई हजार बच्चे दाखिला ले पाते थे। साल 2021 तक करीब ढाई हजार इंजीनियरिंग कॉलेज, 14 सौ पॉली टेक्निकल और दो सौ प्लानिंग और आर्किटेक्ट कॉलेज सक्रिय हैं। आज देश में 23 आईआईटी, 20 आईआईएम और 25 एआईआईएमएस सक्रिय हैं। अगर जनसंख्या के दृष्टिकोण से देखा जाये तो उपरोक्त आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। इसके अलावा उच्च शिक्षा में भी सरकार ने संख्या पर ज्यादा गुणवत्ता पर कम ध्यान रखा है। देश भर में थोक के भाव में विश्वविद्यालय खुले, मगर शिक्षा का स्तर चिंताजनक है। अच्छी पढ़ाई नहीं हो रही है। अधिकांश इंजीनियरिंग कॉलेज तो महज कमाई का अड्डा बन चुका है। फैकल्टी भी अच्छी नहीं और कारगर लैब्स का भी अभाव है। शैक्षिक-ऋण की व्यवस्था भी तर्क एवं न्यायसंगत नहीं है। जरूरतमंद बच्चों की अपेक्षा समर्थ बच्चों को स्कॉलरशिप दिये जाते हैं।

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आने वाली है बसंत पंचमी, जानिए इस दिन क्यों पहनते हैं पीला रंग

आने वाली है बसंत पंचमी, जानिए इस दिन क्यों पहनते हैं पीला रंग

खबरिस्तान नेटवर्क। बसंत पंचमी हर साल माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। बसंत पंचमी का पर्व 26 जनवरी को मनाया जाएगा। इसी दिन से बसंत ऋतु का आगमन हो जाता है। बसंत को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। इसके बाद से ही कड़कड़ाती ठंड से राहत मिलने लगती है। यह पर्व पूरे उत्तर भारत में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। किसानों के लिए इस त्‍योहार का खास महत्‍व है। बसंत पंचमी पर सरसों के खेत लहलहा उठते हैं। चना, जौ, ज्‍वार और गेहूं की बालियां ख‍िलने लगती हैं। बलंत पंचमी के दिन से ही मौसम सुहाना हो जाता है और पेड़-पौधों में नए फल-फूल आने लगते हैं। इस दिन कई जगहों पर पतंगबाजी भी की जाती है। बसंत पंचमी के दिन ही विद्या की देवी मां सरस्‍वती का जन्‍म हुआ था। इसलिए इस दिन सरस्‍वती पूजा करने का भी व‍िधान है। इस दिन पीले कपड़े पहनकर मां सरस्वती की पूजा की जाती है। आइए जानते हैं इस दिन पीला रंग क्यों पहना जाता है। बसंत पंचमी के दिन क्यों पहनते हैं पीला रंग? बसंत पंचमी के दिन पीले रंग के कपड़े पहनकर मां सरस्वती की पूजा करने की परंपरा है। पीला रंग मां सरस्वती को प्रिय है। पौराणिक ग्रंथों में पीले रंग को समृद्धि, ऊर्जा, प्रकाश और आशावाद का प्रतीक माना गया है। इस पर्व के बाद बसंत ऋतु में फसलें पकने लगती हैं और पीले फूल खिलने लगते हैं। इस दिन सब कुछ पीला दिखाई देता है। यही वजह कि इस दिन लोग पीले रंग के कपड़े पहनते हैं और पीला भोजन बनाते हैं। शास्त्रों में पीले रंग को बहुत ही शुभ रंग माना गया है। इसलिए इस दिन लोग पीले वस्त्र धारण कर और हल्दी का तिलक लगाकर मां सरस्वती की पूजा करते हैं। बसंत पंचमी की पूजन विधि बसंत पंचमी के दिन मां सरस्‍वती पूजा का व‍िशेष महत्‍व है। मान्यता है कि सृष्टि के रचियता भगवान ब्रह्मा के मुख से बसंत पंचमी के दिन ही ज्ञान और विद्या की देवी मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। इसी वजह से ज्ञान के उपासक सभी लोग बसंत पंचमी के दिन अपनी आराध्य देवी मां सरस्वती की पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन ना सिर्फ घरों में बल्‍कि श‍िक्षण संस्‍थाओं में भी सरस्‍वती पूजा का आयोजन किया जाता है। इस दिन मां सरस्वती को पीले फूल अर्पित चढ़ाएं जाते हैं और पीली मिठाई का भोग लगाया जाता है। इस दिन वाद्य यंत्रों और किताबों की पूजा भी की जाती है। कुछ लोग बसंत पचंमी के दिन अपने बच्चों का विद्यारंभ संस्कार भी कराते हैं।

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