इस दिवाली पर पूजा के वास्तविक मर्म को जानें

गुरु श्री श्री रवि शंकर

गुरु श्री श्री रवि शंकर



आनंद, समृद्धि, ज्ञान और बोध के साथ-साथ अन्य भी बहुत कुछ प्राप्त करने का पर्व प्रकाश उत्सव दिवाली पर पढ़िए आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के विचार

गुरुदेव श्री श्री रविशंकर।  दिवाली या दीपावली प्रकाश का उत्सव है। यह  आनंद, समृद्धि, ज्ञान और बोध के साथ-साथ अन्य भी बहुत कुछ प्राप्त करने का पर्व है। केवल एक दीप जलाना पर्याप्त नहीं है। ज्ञान के प्रस्फुटन और अंधकार को दूर करने के लिए हमें बहुत से दीपक जलाने की जरूरत है। एक भौतिक दीपक सिर्फ एक प्रतीक है और यह आपका प्रतिनिधित्व करता है। आपको उत्साह, आनंद और प्राण (जीवन शक्ति) से जगमगाना है और यही वास्तविक उत्सव है; ऐसा केवल ज्ञान के द्वारा ही हो सकता है, न कि केवल सुख-सुविधाओं, उपकरणों, धन  या मित्रों के द्वारा।

सच्चा सुख ज्ञान से ही मिलता है। हम पिछले वर्ष में प्राप्त सुरक्षा और आशीर्वाद के लिए देवी माँ को धन्यवाद देने के प्रतीक के रूप में देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। हम दिव्यता के साथ अपने संबंध को पुनः अनुभव  करने के लिए प्रार्थना करते हैं। जो कोई भी परमात्मा के संपर्क में है, उसे किसी वस्तु का अभाव नहीं है। देवत्व हर जगह है लेकिन यह सुप्त है, और पूजा (प्रार्थना) इसे जगाने की प्रक्रिया है। पंडितजन एक बहुत प्राचीन प्रार्थना ऋग्वेद-श्री सूक्तम का जाप करते हैं, जिसे मानव जाति की पहली प्रार्थनाओं में से एक कहा जाता है। इससे पूर्व सभी बाधाओं को दूर करने के लिए भगवान गणपति का आह्वान किया जाता है, फिर एक जल पात्र के द्वारा कलश पूजा की जाती है, जहां सभी दिव्य प्राणियों का आह्वान किया जाता है और इस ग्रह पर सभी के लिए आशीर्वाद हेतु प्रार्थना की जाती है, जिससे उन्हें एक सजग मस्तिष्क, हृदय, बुद्धि और ज्ञान प्राप्त हो। पूजा वह है जो आपके हृदय की परिपूर्णता से उत्पन्न होती है। सम्मान करना ईश्वरीय प्रेम का चिह्न है और पूजा परमात्मा का सम्मान करने की कला है। पूजा की विधि इस बात का अनुकरण करती है कि प्रकृति आपके लिए पहले से ही क्या कर रही है। ईश्वर आपको अनेक रूपों में पूजते हैं। पूजा में आप सब कुछ वापस ईश्वर को अर्पित करते हैं। पूजा में फूल चढ़ाए जाते हैं। 

फूल प्रेम का प्रतीक है। ईश्वर प्रेम में आपके पास माता, पिता, पत्नी, पति, बच्चे, मित्र आदि इतने रूपों से आए हैं। वही प्रेम गुरु के रूप में आपको दिव्य प्रेम के स्तर तक ऊपर उठाने के लिए आता है, जो कि आपका अपना स्वभाव भी है। जीवन में हर ओर  प्रेम के इस फूल को पहचानते हुए हम फूल चढ़ाते हैं। 


फल चढ़ाए जाते हैं, क्योंकि भगवान आपको नियत मौसम में फल देते हैं। आप अन्न अर्पित करते हैं क्योंकि प्रकृति आपको भोजन देती है। मोमबत्ती का प्रकाश और कपूर का शांत प्रकाश अर्पित किया जाता है; उसी प्रकार जैसे प्रकृति में सूर्य और चंद्रमा आपके चारों ओर घूमते हुए आपका पोषण करते हैं। सुगंध के लिए धूप अर्पित की जाती है। पूजा में सभी पांचों इंद्रियों का उपयोग किया जाता है, और इसे गहरी भावना के साथ किया जाता है। पूजा के माध्यम से हम भगवान से कहते हैं, "ओह, जो कुछ तुम मुझे देते हो, मैं तुम्हें वापस देता हूं।" पूजा सम्मान और कृतज्ञता है। यज्ञ अनुष्ठान के अनेक लाभ हैं। यह यश ( नाम), प्रज्ञा (उच्च चेतना), विद्या (शिक्षा), बुद्धि (ज्ञान), बल (शक्ति), वीर्य (वीरता), आयुष (दीर्घायु), ऐश्वर्य (धन) और भी बहुत कुछ प्राप्त कराने के लिए जाना जाता है

"प्रत्येक व्यक्ति में तीन प्रकार की ऊर्जा होती है।

1. इच्छा-शक्ति (व्यक्ति की इच्छा)2. क्रिया-शक्ति (कार्य करने की ऊर्जा)3. ज्ञान-शक्ति (ज्ञान)

इसी तरह, महाकाली (शक्ति का प्रतीक), महालक्ष्मी (भौतिक धन का प्रतीक) और महासरस्वती (ज्ञान का प्रतीक) हैं। ये जीवन के विभिन्न पहलू हैं जो सूक्ष्म ऊर्जा द्वारा नियंत्रित होते हैं, और पूजा सूक्ष्म दुनिया से जुड़ने का एक साधन है। हम जो दुनिया देखते हैं वह केवल हिमशैल की ऊपरी सतह  है क्योंकि और भी बहुत कुछ है। अब, हम यह कैसे करते हैं? हमें बस गहरे ध्यान में बैठना है और मंत्रों को सुनना है; मंत्रों में स्नान करें, जिसे हम भारत में मंत्र स्नान कहते हैं, और हाल ही में पश्चिम में ध्वनि स्नान के रूप में अधिक लोकप्रिय हो गया है। इन प्राचीन मंत्रों के स्पंदन हमारे पूरे अस्तित्त्व  या आत्मा को सक्रिय करते हैं।

यद्यपि हम पूजा में हो रही हर बात को नहीं समझ  सकते हैं, हम बस आंखें बंद करके या आंखें खोलकर बैठते हैं और जो कुछ भी हो रहा है उसे अवशोषित कर लेते हैं। इसे ही श्रद्धा कहते हैं, जिसका अर्थ है अज्ञात के प्रेम में पड़ना। हम जानते हैं कि कुछ है, लेकिन हम नहीं जानते कि वह क्या है। एक बार जब हम इसके प्रति प्रेम अनुभव करते हैं  तो हम इसे जानना आरम्भ कर देते हैं। तब आपको लगता है, "वाह, यह ऊर्जा है।" तब आपको पता चलता है कि देवी माँ केवल एक अवधारणा नहीं है जो किसी के मन से आई है, यह एक वास्तविकता है।

दो कदम हैं - अज्ञात से प्रेम करो और एक बार जब आप ऐसा कर लेते हैं कि आप अज्ञात को जानना शुरू कर देते हैं।  इसके बाद आप अनुभव  करेंगे कि यह आपका एक हिस्सा है और आपसे अलग या दूर नहीं है। यही वेद और वेदांत है, अर्थात् देवत्व को जानना और उसमें लीन होना। 

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