ढलती उम्र कराती है ईश्वर के सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान होने का अहसास



आनलाइन मीडिया ज्ञान - तीन प्रतिक्रियाओं के आधार पर आपके व्यक्तित्व का विश्लेषण करें।

जालंधर। सुख में हम चाहे सिमरन न करें, दुख में हमारे कदम स्वत: मंदिर की ओर मुड़ जाते हैं और मन ईश्वर की ओर । तभी सफलता के लिए हम अपनी क्षमता को और असफलता के लिए भाग्य विधाता को दोषी ठहराते हैं। जवानी में हमें अपनी शक्ति पर गर्व होता है लेकिन ढलती उम्र हमें ईश्वर के सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान होने का अहसास कराती है। यदि आपसे प्रश्न किया जाए कि ईश्वर को जानने और ढूंढने के लिए आप कौन से मार्ग को अधिक प्रभावी समझते हैं तो तीन उत्तर हो सकते हैं 

(क) स्वाध्यय और एकांत ।


(ख) श्रवण, सत्संग और विचार विनिमय ।

 (ग) तीर्थ दर्शन । 

आइए इन प्रतिक्रियाओं के आधार पर आपके व्यक्तित्व का विश्लेषण करें।

(क) पिछले जन्म के संस्कार और पारिवारिक वातावरण के संचित प्रभाव से युक्त व्यक्ति अधिक सरलता से स्वाध्यय और एकांत का मार्ग अपना सकता है। इसके लिए मन में सत्व भाव को बढ़ाने और धीरे-धीरे अहंकार, देहानुभूति और स्वार्थ से विरक्ति आवश्यक है।  

(ख) आम जिंदगी जीते हुए जब आत्मा और परमात्मा के बारे में जानने की इच्छा जगती है तथा उत्तर की खोज सहज और सरल मार्ग की मांग करती है तो श्रवण और सत्संग सुगम है। यूं भी सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में पूजा और कलयुग में सत्संग का फल सर्वश्रेष्ठ माना गया है। हम कलयुग में ही तो जी रहे हैं, इसलिए सत्संग उपयुक्त है। 

(ग) रोजमर्रा की उलझनें अक्सर समय ही नहीं देती कि ईश्वर अर्चना से शांति की ओर बढ़ा जाए। इन परिस्थितियों में ध्यान परिवर्तन के लिए स्थान परिवर्तन की आवश्यकता होती है। तीर्थ दर्शन मन, बुद्धि और शरीर को लौकिक उलझनों से स्वतंत्र करके प्राप्त सुख को व्यापक शांति में बदल सकता है। साभार - रोटेरियन सुरेंद्र सेठ। उन्होंने ये पोस्ट अपनी फेसबुक वॉल पर शेयर की। 

Related Links