नज़रिया

आज़ादी अगर इतनी प्यारी है और मां इतनी बोझ लग रही हैं तो मैं पूरी आज़ादी देना चाहता हूँ

आज़ादी अगर इतनी प्यारी है और मां इतनी बोझ लग रही हैं, तो मैं पूरी आज़ादी देना चाहता हूँ

एक जज अपनी पत्नी को क्यों दे रहे हैं तलाक??? रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्ची घटना।

ढलती उम्र कराती है ईश्वर के सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान होने का अहसास 

ढलती उम्र कराती है ईश्वर के सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान होने का अहसास 

आनलाइन मीडिया ज्ञान - तीन प्रतिक्रियाओं के आधार पर आपके व्यक्तित्व का विश्लेषण करें।


भिखारी ने की अनोखी चोरी और मुल्ला ने चुकाई अनूठी कीमत

भिखारी ने की अनोखी चोरी और मुल्ला ने चुकाई अनूठी कीमत

वेब ख़बरिस्तान। एक समय की बात है। भूख के मारे तड़प रहा एक भिखारी नंदा नगरी में खाने के लिए कुछ मांग रहा था। कहीं से उसे कुछ रोटियां मिल गईं। सब्जी की तलाश में वह एक घर पहुंचा और सब्जी मांगी। घर के मालिक ने उसे खूब कोसा और भगा दिया। भिखारी नज़र बचाकर किसी तरह रसोई तक जा पहुंचा। तरह-तरह की सब्जियों की खुशबू सूंघ उसने रोटियां एक बर्तन पर रख दी, जहां से भाप निकल रही थी। उसने सोचा की भाप के सब्जियों का स्वाद रोटी में आ जाएगा। तभी वहां घर का मालिक आ पहुंचा। उसने भिखारी को पकड़ लिया और सब्जी चोरी का आरोप लगाया। भिखारी बोला उसने सब्जी नहीं चुराई वह तो सिर्फ सब्जियों की महक ले रहा था। मालिक ने कहा तो तुझे महक की कीमत देनी होगी। घर का मालिक उसे पकड़कर मुल्ला नसरुद्दीन के दरबार ले गया। दोनों की सारी बातें सुनकर मुल्ला कुछ देर सोचकर पंडाल मालिक बोले कि तुम्हें अपनी सब्जी की खुशबू के बदले पैसे चाहिए। पंडाल मलिका ने हां में जवाब दिया। मुल्ला ने कहा - सब्जी की महक की कीमत तुम्हें मैं अदा करूंगा। मालिक खुश हो गया। मुल्ला ने कहा महक की कीमत मैं सिक्कों की खनक से अदा करूंगा। मुल्ला ने जेब से सिक्के निकाल और खनका दिए। घर का मालिक बोला - ये कैसी कीमत चुकाई मुल्ला आपने। मुल्ला ने कहा अगर भिखारी ने सब्जी चुराई होती तो वह सिक्के देता। भिखारी ने महक चुराई और मैने सिक्कों की खनक से तुम्हें कीमता चुका दी। शर्मिंदा हुआ घर का मालिक वहां से चला गया। मैनेजमेंट मंत्रा - बुद्धि और चतुराई से हर समस्या हल हो सकती है।

https://webkhabristan.com/najariya/interesting-story-of-mulla-nasrudeen-2122
कोरोना वार्ड से लेकर श्मशान तक पिता की लाश ने बेटी से की बातें

कोरोना वार्ड से लेकर श्मशान तक पिता की लाश ने बेटी से की बातें

और मेरी मौत हो गई... मैं अभी जिंदा था जब बेटे ने मेरे नाक से आक्सीजन की नली उतार जल्दी से जब अपनी मां के मुंह पर लगाई थी.... मेरे वार्ड में हर तरफ अफरा तफरी थी हाथ पैर मार रहे थे वार्ड ब्वाय, नर्सें और मरीजों के परिवार वाले लगा रहे थे लाशों के मुंह से उतारकर आक्सीजन सांस के लिए तरसते मरीजों को इस उमीद के साथ कि शायद कोई मां का लाडला बच जाए मौत और जीवन की इस जंग में मैं थोड़ा बहुत बचा था पत्नी की उखड़ी सांसें टिक रही थीं मगर साथ के बिस्तरों पर पड़े मरीज इतने खुशकिस्मत नहीं थे... मेरे देखते ही अच्छा तो हम चलते हैं कहते अपनी देहों से ऊपर उठ रहे थे मैं अभी मरा नहीं था... पता नहीं मेरी बेटी क्यों मेरे साथ लिपट कर रोने लगी पीपीई किट में मेरी बेटी... और सफेद मरीजों वाले लिबास में मैं दोनों कफन का सामान लग रहे थे उसके गले का हार आक्सीजन सिलेंडर का इंतजाम करते चला गया था वह मेरे साथ लिपट के और रोना चाहती थी पीछे से वार्ड ब्वाय चिल्लाया इसे श्मशान ले जाओ मैडम पीछे और भी कतार है वह स्ट्रैचर धकेलती बाहर आई एंबुलेंस वाले ने किराया मांगा 12 हजार हमें कानों पर यकीन नहीं हो रहा था भला ये चार किलोमीटर तक जाने के इतने पैसे चलना है तो बताओ नहीं तो कंधे पर ले जाना अपने पिता को दिल तो करता था स्ट्रैचर से उठ जाउं और पकडूं गले से इस बदतमीज को पर ये मेरी पहुंच से दूर था... मेरी बेटी ने अपने कंगन उतार दिए मुझे आखरी मंजिल पर जो पहुंचाना था श्मशान की चिमनी का धुआं बहुत गहरा था बेटी को टोकन देकर मुझे और लाखों में धकेल दिया मैं तब तक जिंदा था... श्मशान वालों ने लकड़ी के सात हजार मांगे जैसे लाश उत्सव मना रहे हों बेटी ने आखरी जेवर अपनी अंगूठी भी उतार दी जब मेरे ऊपर लकड़ियां रख रहे थे... और जब आग लगाई गई तब भी ... मैं जिंदा ही था लपटों से झांककर देखा पंडित बेटी को उपदेश दे रहा था इनकी मुक्ति के लिए पूजा जरूरी है दो हजार दक्षिणा देनी होगी मैने बेटी की तरफ देखा... उसके पास उतारने के लिए तन के कपड़े ही बचे थे और अब मेरी मौत हो चुकी थी... इस रचना को लेखक और कवि सुरजीत गग्ग ने अपनी फेसबुक वाल पर शेयर की। ख़बरिस्तान के पाठकों के लिए हिंदी रुपांतरण किया गया है। ..ਤੇ ਮੇਰੀ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ / ਡਾ: ਰਵੇਲ ਸਿੰਘ ਮੈਂ ਹਾਲੇ ਉਦੋਂ ਜ਼ਿੰਦਾ ਸਾਂ ਜਦੋਂ ਮੇਰੇ ਬੇਟੇ ਨੇ ਮੇਰੇ ਨੱਕ ਤੋਂ ਆਕਸੀਜਨ ਦੀ ਨਾਲੀ ਉਤਾਰ ਕਾਹਲੀ ਨਾਲ ਜਦੋਂ ਆਪਣੀ ਮਾਂ ਦੇ ਮੂੰਹ ਉਤੇ ਲਗਾਈ ਸੀ... ਮੇਰੇ ਵਾਰਡ ਵਿਚ ਹਰ ਤਰਫ਼ ਹਫੜਾ ਦਫੜੀ ਸੀ ਹੱਥ ਪੈਰ ਮਾਰ ਰਹੇ ਵਾਰਡ ਬੁਆਏ, ਨਰਸਾਂ, ਮਰੀਜ਼ਾਂ ਦੇ ਘਰ ਦੇ ਜੀਅ... ਲਗਾ ਰਹੇ ਸਨ ਸਾਹੋਂ ਸਹਿਕਦੇ ਮਰੀਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਆਕਸੀਜਨ ਲਾਸ਼ਾਂ ਦੇ ਮੂੰਹਾਂ ਤੋਂ ਲਾਹ ਇਸ ਉਮੀਦ ਨਾਲ ਕਿ ਸ਼ਾਇਦ ਕੋਈ ਬਚ ਹੀ ਜਾਏ ਮਾਂ ਦਾ ਜਾਇਆ ਮੌਤ ਤੇ ਜੀਵਨ ਦੀ ਇਸ ਜੰਗ ਵਿਚ ਮੈਂ ਥੋੜਾ ਬਹੁਤ ਬਚਿਆ ਸਾਂ ਪਤਨੀ ਦੇ ਉੱਖੜੇ ਸਾਹ ਟਿਕ ਰਹੇ ਸਨ ਪਰ ਨਾਲ ਦੇ ਬਿਸਤਰਿਆਂ ਤੇ ਪਏ ਹੋਰ ਮਰੀਜ਼ ਏਨੇ ਖੁਸ਼ਕਿਸਮਤ ਨਹੀਂ ਸਨ... ਮੇਰੇ ਦੇਖਦਿਆਂ ਹੀ ਅੱਛਾ ਤੋ ਹਮ ਚਲਤੇ ਹੈਂ ਕਹਿੰਦੇ ਆਪਣੀਆਂ ਦੇਹਾਂ ਤੋਂ ਉਪਰ ਉੱਠ ਰਹੇ ਸਨ ਮੈਂ ਹਾਲੇ ਮਰਿਆ ਨਹੀਂ ਸਾਂ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਮੇਰੀ ਬੇਟੀ ਕਿਉਂ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਲਿਪਟ ਕੇ ਰੋਣ ਲੱਗ ਪਈ ਸੀ। ਪੀ ਪੀ ਕਿੱਟ ਵਿਚ ਮੇਰੀ ਧੀ... ਤੇ ਚਿੱਟੇ ਮਰੀਜ਼ਾਂ ਵਾਲੇ ਲਿਬਾਸ ਵਿਚ ਮੈਂ ਦੋਵੇਂ ਕੱਫਣ ਦਾ ਸਮਾਨ ਲੱਗ ਰਹੇ ਸਾਂ... ਉਹਦੇ ਗਲ ਦਾ ਹਾਰ ਆਕਸੀਜ਼ਨ ਸਿਲੰਡਰ ਦਾ ਇੰਤਜ਼ਾਮ ਕਰਦਿਆ ਚਲਾ ਗਿਆ ਸੀ ਉਹ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਲਿਪਟ ਕੇ ਹੋਰ ਰੋਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਸੀ ਪਿਛੋਂ ਵਾਰਡ ਬੁਆਏ ਕੜਕਿਆ- “ਇਹਨੂੰ ਸ਼ਮਸ਼ਾਨ ਲੈ ਜਾਓ ਮੈਡਮ ਪਿਛੇ ਹੋਰ ਵੀ ਕਤਾਰ" ਉਹ ਸਟ੍ਰੈਚਰ ਧੱਕਦੀ ਬਾਹਰ ਆਈ ਐਮਬੂਲੈਂਸ ਵਾਲੇ ਨੇ ਕਿਰਾਇਆ ਬਾਰਾਂ ਹਜ਼ਾਰ ਮੰਗਿਆ ਸਾਨੂੰ ਆਪਣੇ ਕੰਨਾਂ ਤੇ ਯਕੀਨ ਨਹੀਂ ਸੀ ਹੋ ਰਿਹਾ ਭਲਾ ਆਹ ਚਾਰ ਕਿਲੋਮੀਟਰ ਤੱਕ ਜਾਣ ਦੇ ਐਨੇ ਪੈਸੇ? “ਚਲਣਾ ਹੈ ਤਾਂ ਦੱਸ... ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਆਪਣੇ ਮੋਢੇ ਤੇ ਲੈ ਜਾ ਆਪਣੇ ਪਿਓ ਨੂੰ ਜੀਅ ਤਾਂ ਕਰਦਾ ਸੀ ਸਟਰੈਚਰ ਤੋਂ ਉੱਠ ਫੜਾਂ ਗਲਮੇ ਤੋਂ ਇਹ ਬਦਤਮੀਜ਼ ਪਰ ਇਹ ਮੇਰੀ ਪਹੁੰਚ ਤੋਂ ਦੂਰ ਸੀ... ਮੇਰੀ ਧੀ ਨੇ ਆਪਣੇ ਕੰਗਣ ਉਤਾਰ ਦਿੱਤੇ ਸਨ ਮੈਨੂੰ ਆਖ਼ਰੀ ਮੰਜ਼ਿਲ ਤੇ ਜੁ ਪਹੁੰਚਾਉਣਾ ਸੀ ਸਮਸ਼ਾਨ ਦੀ ਚਿਮਨੀ ਦਾ ਧੂੰਆਂ ਬਹੁਤ ਗਾੜ੍ਹਾ ਸੀ ਬੇਟੀ ਨੂੰ ਇਕ ਟੋਕਨ ਫੜਾ ਮੈਨੂੰ ਹੋਰ ਲਾਸ਼ਾਂ ਵਿਚ ਧੱਕ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਮੈਂ ਤਦ ਤੱਕ ਜ਼ਿੰਦਾ ਸੀ... ਸ਼ਮਸ਼ਾਨ ਵਾਲਿਆ ਨੇ ਲੱਕੜੀ ਦਾ ਸੱਤ ਹਜ਼ਾਰ ਮੰਗਿਆ ਜਿਵੇਂ ਲਾਸ਼ ਉਤਸਵ ਮਨਾ ਰਹੇ। ਬੇਟੀ ਨੇ ਆਪਣਾ ਆਖਰੀ ਗਹਿਣਾ ਮੁੰਦਰੀ ਵੀ ਉਤਾਰ ਦਿੱਤੀ ਜਦ ਮੇਰੇ ਤੇ ਲੱਕੜਾਂ ਚਿਣ ਰਹੇ ਸਨ... ਤੇ ਜਦੋਂ ਲਾਂਬੂ ਲਾਇਆ ਗਿਆ ਉਦੋਂ ਵੀ ... ਮੈਂ ਜ਼ਿੰਦਾ ਹੀ ਸਾਂ ਲਪਟਾਂ ਚੋਂ ਝਾਕ ਦੇਖਦਾ ਹਾਂ ਪੰਡਿਤ ਬੇਟੀ ਨੂੰ ਉਪਦੇਸ਼ ਦੇ ਰਿਹਾ ਸੀ- “ਇਹਦੀ ਮੁਕਤੀ ਲਈ ਪੂਜਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ... ਦੋ ਹਜ਼ਾਰ ਦਕਸ਼ਣਾ ਦੇਣੀ ਪਏਗੀ ਮੈਂ ਬੇਟੀ ਵੱਲ ਤੱਕਿਆ... ਉਸ ਕੋਲ ਉਤਾਰਨ ਲਈ ਤਨ ਦੇ ਕੱਪੜੇ ਹੀ ਬਚੇ ਸਨ ...ਤੇ ਹੁਣ ਮੇਰੀ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ਸੀ। ਇਹ ਕਵਿਤਾ ਲੇਖਕ ਤੇ ਕਵੀ ਸੁਰਜੀਤ ਗੱਗ ਨੇ ਆਪਣੀ ਫੇਸਬੁੱਕ ਵਾਲ ਤੇ ਸ਼ੇਅਰ ਕੀਤੀ।

https://webkhabristan.com/najariya/ravel-singh-poetry-on-corona-patient-dead-body-with-her-daughter-1886
रीडर्स थॉट - बच्चों के पंख न काटें, उन्हें उड़ने दें

रीडर्स थॉट - बच्चों के पंख न काटें, उन्हें उड़ने दें

सुना है मैंने कि मुल्ला नसरुद्दीन की खिड़की पर एक दिन एक पक्षी आकर बैठ गया। अजनबी पक्षी था, जो मुल्ला ने कभी देखा नहीं था। लंबी उसकी चोंच थी, सिर पर कलगी थी रंगीन, बड़े उसके पंख थे। मुल्ला ने उसे पकड़ा और कहा, मालूम होता है, बेचारे की किसी ने कोई फिक्र नहीं की। कैंची लाकर उसके पंख काट कर छोटे किए; कलगी रास्ते पर लाया; चोंच भी काट दी। और फिर कहा कि अब ठीक कबूतर जैसे लगते हो। मालूम होता है, किसी ने तुम्हारी चिंता नहीं की। अब मजे से उड़ सकते हो।लेकिन अब उड़ने का कोई उपाय न रहा। वह पक्षी कबूतर था ही नहीं। मगर मुल्ला कबूतर से ही परिचित थे; उनकी कल्पना कबूतर से आगे नहीं जा सकती थी।हर बच्चा जो आपके घर में पैदा होता है, अजनबी है। वैसा बच्चा दुनिया में कभी पैदा ही नहीं हुआ। जिन बच्चों से आप परिचित हैं, उनसे इसका कोई संबंध नहीं है। यह पक्षी और है। लेकिन आप इसके पंख वगैरह काट कर, चोंच वगैरह ठीक करके कहोगे कि बेटा, अब तुम जगत में जाने योग्य हुए।तो यहां हर आदमी कटा हुआ जी रहा है; क्योंकि सब लोग चारों तरफ से उसे प्रभावित करने, बनाने, निर्मित करने में इतने उत्सुक हैं जिसका कोई हिसाब नहीं। जब बाप अपने बेटे में अपनी तस्वीर देख लेता है, तब प्रसन्न हो जाता है। क्यों? इससे बाप को लगता है कि मैं ठीक आदमी था; देखो, बेटा भी ठीक मेरे जैसा।अगर मुझे मौका मिले और हजारों लोग मेरे जैसे हो जाएं तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी, क्योंकि मेरे अहंकार का भारी फैलाव हुआ।अहंकार की यही आकांक्षा है: तुम मेरे जैसे हो जाओ..वो अपनी तरह का पक्षी है ... उसे अलग सा रहने दो ... उड़ने दो खुद की उड़ान ... - पूजा प्राशर की फेसबुक वॉल से

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मुल्ला नसरुद्दीन के फार्मूले  -किसी को गधे को आगे लेकर जाओगे तो वह तुम्हारा नुकसान ही करेगा

मुल्ला नसरुद्दीन के फार्मूले  -किसी को गधे को आगे लेकर जाओगे तो वह तुम्हारा नुकसान ही करेगा

एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन जोश जोश में अपने गधे को घर की छत पर ले गए... जब नीचे उतारने लगे तो गधा नीचे उतर ही नहीं रहा था। बहुत कोशिश के बाद भी जब नाकाम हुए तो ख़ुद ही नीचे उतर गए और गधे के नीचे उतरने का इंतज़ार करने लगे।कुछ देर गुज़र जाने के बाद मुल्ला नसरुद्दीन ने महसूस किया कि गधा छत को लातों से तोड़ने को कोशिश कर रहा है। मुल्ला नसरुद्दीन बहुत परेशान हुए कि छत तो नाज़ुक है, इतनी मज़बूत नहीं कि गधे की लातों को बर्दाश्त कर सके। दोबारा ऊपर भागे और गधे को नीचे लाने की कोशिश की, लेकिन गधा अपनी ज़िद पर अटका हुआ था और छत को तोड़ने में लगा हुआ था।मुल्ला आख़िरी कोशिश करते हुए उसे धक्के देकर नीचे लाने की कोशिश करने लगे तो गधे ने मुल्ला को लात मारी और वह नीचे गिर गए। गधा फिर छत को तोड़ने लगा... आख़िरकार छत टूट गयी और गधे समेत ज़मीन पर आ गिरी। मुल्ला काफी देर तक इस वाक़ये पर ग़ौर करते रहे और फिर ख़ुद से कहा कि कभी भी गधे को ऊँचे मकाम पर नहीं ले जाना चाहिये एक तो वह ख़ुद का नुकसान करता है, दूसरा ख़ुद उस जगह को भी ख़राब करता है और तीसरा ऊपर ले जाने वाले को भी नुक़सान पहुँचाता है।

https://webkhabristan.com/najariya/mulla-nasrudin-story-of-his-donkey-1783
जब दुनिया में हैजा फैला तो ओशो ने महामारी को लेकर ये कहा था

जब दुनिया में हैजा फैला तो ओशो ने महामारी को लेकर ये कहा था

कोरोना ने दुनिया भर में तबाही मचा रखी है। इस समय भारत इसकी गिरफ्त में है। रोजाना हजारों मौतें हो रही हैं और लाखों पाजेटिव आ रहे हैं। बिमारी से ज्यादा अब डर फैल चुका है। पूरे देश में आक्सीजन को लेकर संकट बना हुआ है। आक्सीजन की कमी से अस्पतालों में कई लोगों की मौत हो गई। गंगा में लाशें मिली हैं। दिल्ली में कई श्मशान घाटों पर रोज सौ से ज्यादा संस्कार किए गए। जरा सा बुखार हो जाए। फौरन ध्यान कोरोना पर जाता है। अजीब से माहौल है। हर कोई तनाव में हैं। ऐसे माहौल में महापुरुषों की बातें कुछ हिम्मत देती हैं। महामारी को लेकर हमारे कई ग्रंथों में जिक्र मिलते हैं। अलग-अलग संतों महात्माओं ने इस पर बात की है। 70 के दशक में जब देश में हैजा फैला था तो ओशो ने एक भक्त के सवाल पूछने पर महामारी को लेकर प्रवचन दिए थे, जिन्हें अपने पाठकों के लिए हम पेश कर रहे हैं। बात सत्तर के दशक की है। पूरी दुनिया में हैजा फैला हुआ था। तब एक प्रवचन के दौरान किसी ने ओशो से पूछा था कि इस महामारी से कैसे बचें? कोरोना महामारी के दौर में उपजे इस अवसाद, नकारात्मकता और डर से लड़ने के लिए ओशो का जवाब एक कारगर उपाय सा लगता है. ओशो ने कहा था कि आपका यह प्रश्न ही गलत है. आपको पूछना चाहिए कि इस महामारी से मरने का जो डर है, इससे कैसे बचा जाए? ओशो ने कहा था कि महामारी से बचना आसान है, लेकिन इसकी वजह से जो डर लोगों में पैदा हुआ है, उससे बचना मुश्किल है. लोग इस महामारी से कम और इसकी वजह से उपजे डर से ज्यादा मरेंगे. 'डर' से ज्यादा खतरनाक वायरस इस दुनिया में कोई नहीं है. इस डर को समझिए, अन्यथा मौत से पहले ही आप एक जिंदा लाश बन जाएंगे. ओशो ने कहा था कि इस भयावह माहौल का वायरस आदि से कोई लेना देना नहीं है. यह एक सामूहिक पागलपन है, जो एक अंतराल के बाद हमेशा घटता रहता है. कारण बदलते रहते हैं, कभी सरकारों की प्रतिस्पर्धा, कभी कच्चे तेल की कीमतें, कभी दो देशों की लड़ाई, तो कभी जैविक हथियारों की टेस्टिंग. सामान्यत: आप अपने डर के मालिक होते हैं, लेकिन सामूहिक पागलपन के क्षण में आपकी मिल्कियत छिन सकती है. टीवी पर खबरें सुनना या अखबार पढ़ना बंद करें. ऐसा कोई भी वीडियो या न्यूज मत देखिए, जो आपके भीतर डर पैदा कर रहा हो. प्रशासनिक आदेशों तथा सरकार के निर्देशों का अक्षरशः पालन करें. महामारियों के अलावा भी बहुत कुछ है, जिस पर ध्यान दिया जा सकता है.ओशो ने कहा था कि महामारी से बचना आसान है, लेकिन इसकी वजह से जो डर लोगों में पैदा हुआ है, उससे बचना मुश्किल है। धीरज रखिए, जल्द ही सब कुछ बदल जाएगा. जब तक मौत आ ही न जाए, तब तक उससे डरने की कोई जरूरत नहीं है. जो अपरिहार्य है, उससे डरने का कोई अर्थ भी नहीं है. डर एक प्रकार की मूढ़ता है, अगर किसी महामारी से अभी नहीं भी मरे, तो भी एक न एक दिन मरना ही होगा और वो एक दिन कोई भी दिन हो सकता है. * इस लेख में लेखक के विचार निजी हैं. ये जरूरी नहीं कि वेब ख़बरिस्तान उनसे सहमत हो। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।

https://webkhabristan.com/najariya/osho-discourse-on-pandemic-relevant-covid-present-situation-1782