दीदी ओ दीदी तंज का हुआ नुकसान



बंगाल चुनाव परिणाम के रुझान तृणमूल के पक्ष में आने के साथ ही ट्विटर पर 'दीदी-ओ-दीदी ट्रेंड करने लगा। तृणमूल सांसद काकोली घोष दास्तीदार ने लिखा, 'दीदी ओ दीदी बोलने वाला दादा कहां गया?

मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं था

यह सच है कि इस चुनाव में भाजपा काफी मजबूती के साथ तृणमूल कांग्रेस का सामना किया, लेकिन ममता के बराबर कोई नेता या मुख्यमंत्री के चेहरा न होना बड़ी कमजोरी साबित हुई। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने भी कई बार इस पर चिंता जाहिर की। पार्टी ने पूरा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही लड़ा। 


ममता ने बीजेपी को बाहरी साबित किया

ममता भाजपा को शुरुआत से बाहरी बताती रहीं और अपने ऊपर हुए हमलों को बंगाली अस्मिता से जोड़ दिया। भाजपा अगर तोलाबाजी, कटमनी और उनकी पार्टी के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर ही चुनाव लड़ती तो शायद इससे ज्यादा अच्छा प्रदर्शन कर पाती। ममता परिवार को निशान बनाने का फैसला गलत साबित हुआ।


दावे जो वफा न हो सके

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा दावा करते रहे कि भाजपा 200 का आंकड़ा पार कर जाएगी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी बंगाल में 18 बड़ी रैलियां कीं। पीएम मोदी रैलियों में ममता बनर्जी पर दीदी ओ दीदी कहकर तंज कसते थे। इस तंज को तृणमूल कांग्र्रेस ने मुद्दा बनाया और पलटवार किया था।



ध्रुवीकरण की रणनीति फेल 

ध्रुवीकरण बड़ा मुद्दा रहा। भाजपा ने ममता बनर्जी और तृणमूल पर तुष्टीकरण का आरोप लगाया। भाजपा ने रैलियों में जय श्री राम के नारे पर हुए विवाद को मुद्दा बनाकर पेश किया। जवाब में ममता बनर्जी ने मंच पर चंडी पाठ किया, फिर अपना गोत्र भी बताया और हरे कृष्ण हरे हरे का नारा दिया। माना जा रहा था कि हिंदू वोटर भाजपा के पक्ष में आएंगे पर ये हो न सका।


दल बदलू दे गए फायदा

ममता ने भाजपा पर खरीद-फरोख्त का आरोप लगाते हुए इन नेताओं को दल-बदलू, धोखेबाज और मीरजाफर तक कहा। ममता बनर्जी ने इसे इस तरह से प्रोजेक्ट किया कि उनके अपनों ने ही उन्हेंं धोखा दिया क्योंकि वह खुद बेईमान थे। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ममता के इस दांव से उन्हें फायदा मिला।


भाजपा ने आपने नाराज किए

भाजपा ने दूसरे दलों के नेताओं को पार्टी में शामिल कराया और टिकट दिए। पार्टी ने अपने नेताओं की नाराजगी मोल ले ली। टिकट बंटवारे के दौरान बंगाल भाजपा यूनिट में विरोध देखने को मिला था। विवश होकर भाजपा को कई बार संशोधन भी करना पड़ा। हालांकि अपनों के बजाय बाहरी नेताओं पर अधिक भरोसा पार्टी की अंदरूनी लड़ाई की वजह बना।


कोरोना में आक्सीजन की कमी और भाजपा में वोटों की

कोरोना की दूसरी लहर बेकाबू हो गई। देश में मेडिकल ऑक्सीजन की कमी का मुद्दा इन दिनों गर्माया हुआ है। मरीज ऑक्सीजन न मिल पाने के चलते दम तोड़ रहे हैं तो  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी का हाल भी कुछ ऐसा ही हुआ है। यहां वोटों की ऐसी किल्लत हुई है कि भाजपा की बंगाल जीतने की हसरत भी दम तोड़ती नजर आई। 


नारों ने बदली तस्वीर

ममता बनर्जी की तेजतर्रार छवि, बंगाली अस्मिता, महिलाओं और अल्पसंख्यकों का टीएमसी की ओर बड़ा झुकाव का सीधा फायदा तृणमूल को मिला। तृणमूल ने भाजपा की हिंदू वोटों की ध्रुवीकरण की कोशिश की काट करने के लिए 'बंगाल को चाहिए अपनी बेटीÓ का नारा देकर महिला वोटरों को बड़े पैमाने पर अपने पाले में खींचा। (सभी फोटो इंटरनेट से ली गई हैं।)

Related Links